660 मेगावाट बिजली उत्पादन के साथ 1324 एमसीएम पानी का होगा भंडारण, हिमाचल को बिजली में हिस्सेदारी के साथ 90 फीसदी लागत केंद्र उठाएगा
शिमला। करीब 17 वर्षों से अटकी किशाऊ बहुउद्देश्यीय परियोजना के निर्माण की राह अब साफ होती नजर आ रही है। ऊपरी यमुना बेसिन की इस महत्वाकांक्षी परियोजना को लेकर हिमाचल प्रदेश समेत छह राज्यों के बीच सोमवार को महत्वपूर्ण समझौता होने के बाद इसके आगे बढ़ने की उम्मीद जगी है।
मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू सोमवार दोपहर दिल्ली रवाना हुए और मंगलवार को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में होने वाले कार्यक्रम में किशाऊ बांध परियोजना के समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए जाएंगे। इस दौरान हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली और राजस्थान के बीच समझौता होगा।
किशाऊ परियोजना टौंस नदी पर प्रस्तावित है, जो यमुना की प्रमुख सहायक नदी है। परियोजना स्थल हिमाचल प्रदेश के सिरमौर और उत्तराखंड के देहरादून क्षेत्र की सीमा पर स्थित है। परियोजना की स्थापित बिजली उत्पादन क्षमता 660 मेगावाट होगी। इसमें 165 मेगावाट की चार इकाइयां प्रस्तावित हैं। बांध के निर्माण से करीब 1324 मिलियन क्यूबिक मीटर (एमसीएम) लाइव जल भंडारण क्षमता विकसित होगी।
पानी के बदले बिजली में हिस्सेदारी
समझौते का हिमाचल के लिए सबसे अहम पहलू पानी और बिजली से जुड़ा है। तय व्यवस्था के तहत परियोजना के जल घटक की करीब 90 फीसदी लागत केंद्र सरकार वहन करेगी, जबकि शेष 10 फीसदी राशि छह राज्यों के बीच साझा की जाएगी।
वहीं, हिमाचल के हिस्से के पानी का उपयोग दिल्ली और राजस्थान में किया जाएगा। इसके बदले इन दोनों राज्यों की ओर से हिमाचल के हिस्से की बिजली घटक की लागत में योगदान किया जाएगा। इससे हिमाचल को अपने आवंटित पानी के बदले परियोजना से बिजली संबंधी आर्थिक लाभ हासिल होगा।
97 हजार हेक्टेयर क्षेत्र को सिंचाई और पेयजल लाभ
किशाऊ परियोजना का उद्देश्य केवल बिजली उत्पादन तक सीमित नहीं है। परियोजना से करीब 97,076 हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराने तथा पेयजल और औद्योगिक उपयोग के लिए पानी उपलब्ध कराने की योजना है। इसके अलावा यमुना नदी में स्वच्छ जल का प्रवाह बढ़ाने और ऊपरी यमुना बेसिन में जल उपलब्धता को मजबूत करने में भी परियोजना की महत्वपूर्ण भूमिका मानी जा रही है।
परियोजना के तहत करीब 236 मीटर ऊंचे कंक्रीट ग्रेविटी बांध के निर्माण का प्रस्ताव है। इसके पूरा होने के बाद सालाना करीब 1379 मिलियन यूनिट बिजली उत्पादन का अनुमान है। हिमाचल और उत्तराखंड के लिए 660 मेगावाट की जलविद्युत क्षमता ऊर्जा क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
हिमाचल में 1498 हेक्टेयर जमीन डूब क्षेत्र में
परियोजना के निर्माण का हिमाचल पर सीधा प्रभाव भी पड़ेगा। उपलब्ध परियोजना विवरण के अनुसार हिमाचल प्रदेश में करीब 1498 हेक्टेयर और उत्तराखंड में करीब 1452 हेक्टेयर क्षेत्र जलमग्न होगा। दोनों राज्यों में कुल 17 गांव प्रभावित होने का अनुमान है और करीब 5500 लोगों के पुनर्वास की आवश्यकता परियोजना दस्तावेजों में बताई गई है।
हिमाचल में परियोजना से करीब आठ गांव और 2,092 लोग प्रभावित होने का अनुमान है। परियोजना को लेकर हिमाचल और उत्तराखंड ने पहले ही संयुक्त उपक्रम स्थापित किया हुआ है। किशाऊ कॉरपोरेशन लिमिटेड का गठन जनवरी 2017 में किया गया था।
2008 में राष्ट्रीय परियोजना घोषित हुई थी
किशाऊ परियोजना को वर्ष 2008 में राष्ट्रीय परियोजना घोषित किया गया था, लेकिन पानी के बंटवारे, लागत वहन और विभिन्न राज्यों के बीच सहमति जैसे मुद्दों के कारण यह लंबे समय तक आगे नहीं बढ़ सकी। जून 2026 में केंद्र की पहल पर छह राज्यों के बीच सहमति बनने के बाद परियोजना के लिए MoU का रास्ता साफ हुआ है।
MoU पर हस्ताक्षर के बाद परियोजना को अंतिम मंजूरी के लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल के समक्ष रखा जाना है। ऐसे में करीब डेढ़ दशक से अधिक समय से लंबित परियोजना के निर्माण की दिशा में अब ठोस प्रगति की उम्मीद है।
हिमाचल के लिए दोहरा फायदा
हिमाचल के लिए किशाऊ परियोजना को आर्थिक और ऊर्जा, दोनों लिहाज से अहम माना जा रहा है। एक ओर परियोजना में राज्य के हिस्से के पानी का इस्तेमाल दिल्ली और राजस्थान में होगा, वहीं इसके बदले बिजली घटक में आर्थिक भागीदारी का लाभ मिलेगा। दूसरी ओर जल घटक की लागत का 90 फीसदी केंद्र द्वारा वहन किए जाने से परियोजना का वित्तीय बोझ भी काफी कम होगा।
परियोजना के पूरा होने के बाद ऊपरी यमुना बेसिन के राज्यों को पेयजल और सिंचाई के लिए अतिरिक्त पानी उपलब्ध होगा। साथ ही 660 मेगावाट की जलविद्युत क्षमता हिमाचल और उत्तराखंड के ऊर्जा क्षेत्र को मजबूती देगी। इस लिहाज से मंगलवार को होने वाला समझौता किशाऊ परियोजना के साथ-साथ हिमाचल के लिए भी महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।












