हाईकोर्ट ने खारिज किए दो मुकदमे
शिमला। हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने भूमि खरीद-फरोख्त से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि यदि किसी संपत्ति सौदे में खरीदार द्वारा दी गई बयाना राशि का चेक ही बाउंस हो जाए, तो यह इस बात का संकेत है कि वह शुरू से ही सौदे को पूरा करने के लिए तैयार और सक्षम नहीं था। ऐसे मामलों में विशिष्ट अनुतोष (Specific Performance) की राहत का दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता।
न्यायमूर्ति सुशील कुकरेजा की एकल पीठ ने यह टिप्पणी करते हुए बद्दी (जिला सोलन) स्थित दो भूखंडों से जुड़े मामले में दायर दो अलग-अलग दीवानी वादों को खारिज कर दिया।
मामले के अनुसार वर्ष 2018 में वादी और प्रतिवादी के बीच 1.60 करोड़ रुपये में दो प्लॉटों की बिक्री का समझौता हुआ था। समझौते के तहत वादी ने 50 लाख रुपये का चेक बयाना राशि के रूप में दिया था, जबकि शेष राशि रजिस्ट्री के समय अदा की जानी थी। प्रतिवादी द्वारा चेक बैंक में प्रस्तुत किए जाने पर वह खाते में पर्याप्त धनराशि न होने के कारण अनादृत (बाउंस) हो गया।
इसके बाद वादी ने अदालत में विशिष्ट अनुतोष की मांग करते हुए प्रतिवादी को भूमि अपने नाम हस्तांतरित करने का निर्देश देने की प्रार्थना की। सुनवाई के दौरान वादी ने दलील दी कि 50 लाख रुपये का चेक केवल सुरक्षा (Security) के उद्देश्य से दिया गया था और दोनों पक्षों के बीच यह सहमति थी कि इसे बैंक में प्रस्तुत नहीं किया जाएगा।
हालांकि, न्यायालय ने बिक्री समझौते का अवलोकन करने पर पाया कि उसमें ऐसी किसी शर्त या आपसी सहमति का कोई उल्लेख नहीं है। अदालत ने माना कि वादी का यह दावा रिकॉर्ड से समर्थित नहीं है।
अपने आदेश में अदालत ने कहा कि विशिष्ट अनुतोष एक न्यायसंगत एवं विवेकाधीन राहत है, जो केवल उस पक्ष को दी जा सकती है जो स्वयं ईमानदारी और स्वच्छ आचरण के साथ अदालत के समक्ष आए। यदि बयाना राशि का चेक ही अनादृत हो जाए, तो इससे यह संकेत मिलता है कि खरीदार के पास समझौते के समय आवश्यक धनराशि उपलब्ध नहीं थी और वह अनुबंध का पालन करने के लिए तैयार एवं सक्षम नहीं था।
अदालत ने यह भी कहा कि सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के आदेश 7 नियम 11(ए) के तहत ऐसे वाद, जिनमें प्रथम दृष्टया कारण-ए-दावा (Cause of Action) नहीं बनता या जो टिकाऊ नहीं हैं, उन्हें प्रारंभिक स्तर पर ही निरस्त किया जा सकता है, ताकि न्यायालय का समय अनावश्यक मुकदमों में व्यर्थ न हो।
इन्हीं आधारों पर हाईकोर्ट ने वादी द्वारा दायर दोनों दीवानी मुकदमों को बिना ट्रायल के ही खारिज कर दिया।












