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कोमिक में एचपीयू ने सिखाई जैव उर्वरक और वर्मी कम्पोस्ट बनाने की तकनीक

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छह दिवसीय कार्यशाला में किसानों, महिला समूहों और युवाओं को सतत कृषि व जैविक खेती का दिया प्रशिक्षण

शिमला।  हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय (एचपीयू) के जैव विज्ञान विभाग ने जनजातीय विकास बोर्ड हिमाचल प्रदेश के वित्तीय सहयोग से विश्व के सबसे ऊंचाई वाले गांवों में शामिल कोमिक (स्पीति) में छह दिवसीय प्रशिक्षण-सह-कार्यशाला आयोजित कर स्थानीय किसानों, महिला स्वयं सहायता समूहों और युवाओं को जैव उर्वरक एवं वर्मी कम्पोस्ट उत्पादन की आधुनिक तकनीकों का प्रशिक्षण दिया। कार्यशाला 28 जून से 3 जुलाई तक आयोजित की गई।

कार्यक्रम का उद्देश्य जनजातीय क्षेत्रों में सतत कृषि, जैविक खेती और स्थानीय जैव अपशिष्ट के वैज्ञानिक प्रबंधन को बढ़ावा देकर किसानों की आजीविका मजबूत करना रहा। प्रशिक्षण के दौरान प्रतिभागियों को जैव अपशिष्ट के वैज्ञानिक प्रबंधन, वर्मी कम्पोस्ट इकाइयों की स्थापना, शीतप्रिय (कोल्ड-टॉलरेंट) सूक्ष्मजीवों के उपयोग तथा उच्च हिमालयी क्षेत्रों के लिए उपयुक्त जैव उर्वरक तैयार करने की तकनीकों की व्यावहारिक जानकारी दी गई।

परियोजना की प्रधान अन्वेषक एवं एचपीयू के जैव विज्ञान विभाग की सहायक आचार्य डॉ. नीलम कुमारी ने बताया कि स्पीति जैसे अत्यधिक ठंडे क्षेत्रों के लिए विशेष प्रकार के शीतप्रिय सूक्ष्मजीव आधारित जैव उर्वरक विकसित किए जा रहे हैं, क्योंकि सामान्य जैव उर्वरक कम तापमान में प्रभावी नहीं रहते। उन्होंने कहा कि इस तकनीक से कृषि एवं घरेलू जैव अपशिष्ट का बेहतर उपयोग होगा, रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता घटेगी और मिट्टी की उर्वरता बढ़ेगी।

उन्होंने बताया कि परियोजना के सह-प्रधान अन्वेषक जैव प्रौद्योगिकी विभाग के सहायक आचार्य डॉ. रवि कांत हैं, जो शोध दल के साथ इस परियोजना पर कार्य कर रहे हैं।

कार्यशाला में प्रतिभागियों को अपने-अपने गांवों में वर्मी कम्पोस्ट इकाइयां स्थापित करने के लिए तकनीकी मार्गदर्शन भी दिया गया। विशेषज्ञों ने बताया कि हिमालयी क्षेत्रों से पृथक किए गए शीतप्रिय सूक्ष्मजीवों पर आधारित यह तकनीक ट्रांस-हिमालयी क्षेत्रों के लिए विशेष रूप से उपयोगी साबित होगी।

कार्यक्रम में जलवायु अनुकूल कृषि, जैविक खेती, ठोस जैव अपशिष्ट प्रबंधन और पर्वतीय पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण पर भी विशेष चर्चा हुई। प्रतिभागियों ने मटर, जौ, आलू और औषधीय पौधों की खेती में इन तकनीकों को अपनाने में रुचि दिखाई।

समापन अवसर पर डॉ. नीलम कुमारी ने कहा कि भविष्य में स्पीति के अन्य गांवों में भी ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे, ताकि अधिक से अधिक जनजातीय किसान पर्यावरण अनुकूल खेती अपनाकर अपनी आय बढ़ा सकें।