मई से सितंबर तक 2,800–4,000 मीटर की ऊंचाई पर करता है प्रजनन
विशेषज्ञ बोले, हिमालय की पारिस्थितिक सेहत का अहम संकेतक है यह दुर्लभ गीत-पक्षी
किन्नौर। जब किन्नौर की ऊंची चोटियों से बर्फ पिघलनी शुरू होती है, तब हिमालय की वादियों में एक दुर्लभ और शर्मीला मेहमान भी दस्तक देता है। दक्षिण-पूर्व एशिया से आने वाला व्हाइट-बेलिड रेडस्टार्ट (Luscinia phaenicuroides) हर वर्ष मई से सितंबर के बीच रकछम–छितकुल वन्यजीव अभयारण्य की ऊंचाई वाली झाड़ियों में अपना प्रजनन काल बिताता है। यही कारण है कि यह अभयारण्य पश्चिमी हिमालय में इस दुर्लभ पक्षी के सबसे महत्वपूर्ण प्रजनन स्थलों में शुमार हो रहा है।
विशेषज्ञों के अनुसार यह पक्षी दिखाई देने से पहले अपनी मधुर सीटी और तीखी “टुक-टुक” पुकार से अपनी मौजूदगी का एहसास कराता है। नर पक्षी स्लेटी-नीले शरीर, सफेद पेट और चमकीली लाल-भूरी पूंछ के कारण बेहद आकर्षक दिखाई देता है, जबकि मादा अपने भूरे रंग के कारण झाड़ियों में आसानी से छिप जाती है।
ईबर्ड समीक्षक डॉ. मल्यश्री भट्टाचार्य ने बताया कि व्हाइट-बेलिड रेडस्टार्ट ऊंचाई के अनुसार मौसमी प्रवास करने वाली प्रजाति है, जो मई-जून में प्रजनन स्थलों पर पहुंचती है। यह पेड़ों की ऊपरी सीमा (ट्रीलाइन) के पास घनी झाड़ियों में जमीन के समीप कटोरीनुमा घोंसला बनाकर सामान्यतः दो से तीन नीले अथवा नीले-हरे रंग के अंडे देती है। उन्होंने कहा कि स्वस्थ और कम हस्तक्षेप वाली झाड़ियां इसके सफल प्रजनन के लिए बेहद आवश्यक हैं।
बर्ड काउंट इंडिया के क्षेत्रीय समन्वयक एवं खंड वन अधिकारी संतोष कुमार ठाकुर ने बताया कि पिछले दो प्रजनन सत्रों में रकछम–छितकुल अभयारण्य में इस पक्षी के सात से आठ प्रजनन स्थलों का रिकॉर्ड दर्ज किया गया है। उनका मानना है कि वैज्ञानिक सर्वेक्षण बढ़ने पर ऐसे और भी कई स्थान सामने आ सकते हैं। उन्होंने बताया कि प्रजनन काल में यह पक्षी मुख्य रूप से कीड़ों के लार्वा पर निर्भर रहता है।
वन्यजीव विशेषज्ञ हिमांशु चौधरी ने कहा कि कश्मल, जूनिपर और बुरांश की घनी झाड़ियां इस पक्षी को सुरक्षित घोंसला बनाने और शिकारियों से बचाव के लिए उपयुक्त वातावरण उपलब्ध कराती हैं। वहीं अंकुश ठाकुर ने बताया कि यह प्रजाति रकछम–छितकुल के अलावा रुपिन दर्रे, चांशल दर्रे और पांगी घाटी तक भी प्रजनन करती है, जिससे पश्चिमी हिमालय में इसके संरक्षण की आवश्यकता और बढ़ जाती है।
वन्यजीव विशेषज्ञ गैरी भट्टी के अनुसार व्हाइट-बेलिड रेडस्टार्ट ऐसा पक्षी है, जिसे देखने के लिए धैर्य और प्रकृति के प्रति संवेदनशील दृष्टि की आवश्यकता होती है। इसका रहस्यमयी स्वभाव हिमालय की जैव-विविधता की अनमोल विरासत की याद दिलाता है।
अरण्यपाल (वन्यजीव) शिमला प्रीति भंडारी (आईएफएस) ने कहा कि हिमाचल की जैव-विविधता का संरक्षण सभी की साझा जिम्मेदारी है और इसमें वन अधिकारियों, विशेषज्ञों तथा स्वयंसेवकों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।
उपायुक्त किन्नौर डॉ. अमित कुमार शर्मा (आईएएस) ने कहा कि किन्नौर की प्राकृतिक विरासत जिले की सबसे बड़ी पूंजी है। जंगलों और ऊंचाई वाले पारिस्थितिक तंत्रों का संरक्षण सुनिश्चित करना आवश्यक है, ताकि व्हाइट-बेलिड रेडस्टार्ट जैसी दुर्लभ प्रजातियां आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित रह सकें।
हाल ही में रकछम–छितकुल अभयारण्य के दौरे पर पहुंचीं वरिष्ठ पुलिस महानिदेशक, चंडीगढ़ नीरजा वी. (आईपीएस) ने भी इस पक्षी को उसके प्राकृतिक आवास में देखने के अनुभव को अविस्मरणीय बताया।
वहीं उप अरण्यपाल अशोक नेगी (आईएफएस) और प्रभागीय वन अधिकारी डी. ढडवाल ने कहा कि इस तरह के वैज्ञानिक रिकॉर्ड हिमालयी वन्यजीवों के संरक्षण और भविष्य की रणनीति तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि भले ही व्हाइट-बेलिड रेडस्टार्ट वर्तमान में वैश्विक स्तर पर संकटग्रस्त प्रजाति नहीं है, लेकिन ऊंचाई वाले स्वस्थ झाड़ीदार आवासों पर इसकी निर्भरता इसे हिमालय की पारिस्थितिक सेहत का महत्वपूर्ण संकेतक बनाती है।
रकछम-छितकुल वन्यजीव अभयारण्य से लगातार मिल रहे प्रजनन रिकॉर्ड इस बात का प्रमाण हैं कि हिमालय के संवेदनशील पारिस्थितिक तंत्रों के संरक्षण, वैज्ञानिक शोध और जनभागीदारी को और अधिक मजबूत करने की आवश्यकता है।












