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प्राकृतिक खेती से मजबूत हो रही हिमाचल की ग्रामीण अर्थव्यवस्था, हमीरपुर में 8.64 करोड़ की अत्याधुनिक लैब करेगी प्राकृतिक उत्पादों की गुणवत्ता जांच

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शिमला। हिमाचल प्रदेश में प्राकृतिक खेती अब केवल पर्यावरण संरक्षण का माध्यम नहीं, बल्कि किसानों की आय बढ़ाने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाने का बड़ा आधार बनती जा रही है। मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविंद्र सिंह सुक्खू के नेतृत्व में राज्य सरकार प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए कई नई पहल कर रही है। इसी कड़ी में हमीरपुर में 8.64 करोड़ रुपये की लागत से स्थापित राज्य अवशेष परीक्षण प्रयोगशाला प्राकृतिक उत्पादों की गुणवत्ता और प्रमाणिकता की वैज्ञानिक जांच करेगी।


प्रदेश सरकार का दावा है कि हिमाचल देश का पहला राज्य है, जिसने प्राकृतिक खेती से तैयार फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) लागू किया है। वर्तमान में प्राकृतिक गेहूं 80 रुपये प्रति किलो, मक्की 50 रुपये, कच्ची हल्दी 150 रुपये, पांगी घाटी की जौ 80 रुपये और अदरक 30 रुपये प्रति किलो की दर से खरीदी जा रही है।


सरकार के अनुसार प्राकृतिक खेती के प्रति किसानों का रुझान लगातार बढ़ रहा है। वित्त वर्ष 2024-25 में जहां 838 किसानों से 2,123.58 क्विंटल प्राकृतिक गेहूं खरीदा गया था, वहीं मौजूदा रबी सीजन में 1,891 किसानों से 2,679.89 क्विंटल गेहूं की खरीद की गई है।


जनजातीय क्षेत्रों में भी प्राकृतिक खेती को विशेष प्रोत्साहन दिया जा रहा है। चंबा जिले के पांगी उपमंडल को राज्य का पहला प्राकृतिक खेती उपमंडल घोषित किया गया है। यहां की विभिन्न पंचायतों के किसानों ने पिछले खरीफ सीजन में प्राकृतिक तरीके से उत्पादित जौ की बेहतर कीमत पर बिक्री की। वहीं हाल ही में बड़ा भंगाल दौरे के दौरान मुख्यमंत्री ने क्षेत्र को प्राकृतिक खेती पंचायत बनाने और वहां उत्पादित राजमाह के लिए जीआई टैग की दिशा में कार्य करने के निर्देश दिए।


प्रदेश में वर्तमान समय में 2,56,870 किसान 44,784.73 हेक्टेयर भूमि पर प्राकृतिक खेती कर रहे हैं। प्राकृतिक उत्पादों के बेहतर विपणन के लिए कृषि विभाग में अलग मार्केटिंग विंग स्थापित करने की प्रक्रिया भी शुरू की जा रही है।


इस बीच हमीरपुर में स्थापित राज्य अवशेष परीक्षण प्रयोगशाला प्राकृतिक खेती को वैज्ञानिक आधार देने में अहम भूमिका निभाएगी। अत्याधुनिक विश्लेषणात्मक उपकरणों से लैस यह लैब कृषि उत्पादों में मौजूद सूक्ष्म तत्वों की जांच कर सकेगी। साथ ही प्राकृतिक उत्पादों की गुणवत्ता और प्रमाणिकता का परीक्षण भी किया जाएगा, जिससे किसानों को बेहतर बाजार और उपभोक्ताओं को प्रमाणित उत्पाद उपलब्ध हो सकेंगे।


प्रदेश सरकार का कहना है कि शून्य बजट प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देकर न केवल किसानों की आय बढ़ाई जा रही है, बल्कि मिट्टी की उर्वरता, पर्यावरण संरक्षण और लोगों के स्वास्थ्य को भी प्राथमिकता दी जा रही है। सरकार का लक्ष्य हिमाचल के प्राकृतिक खेती मॉडल को राष्ट्रीय स्तर पर एक आदर्श मॉडल के रूप में स्थापित करना है।