मुख्यमंत्री बोले- हिमाचल के वैधानिक अधिकार सुनिश्चित होने तक नए समझौते नहीं; किशाऊ परियोजना को BBMB बकाया से जोड़ा
शिमला। किशाऊ बहुउद्देश्यीय बांध परियोजना में हिमाचल प्रदेश के हित सुरक्षित कराने के बाद मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविंदर सिंह सुक्खू ने अब भाखड़ा ब्यास प्रबंधन बोर्ड (बीबीएमबी) से राज्य के लंबित वित्तीय अधिकार और बकाया राशि की वसूली के प्रयास तेज कर दिए हैं। मुख्यमंत्री ने सोमवार को केंद्रीय ऊर्जा मंत्री मनोहर लाल खट्टर से फोन पर बातचीत कर इस मुद्दे पर केंद्र सरकार से सक्रिय सहयोग का आग्रह किया।
मुख्यमंत्री ने केंद्रीय मंत्री को बताया कि हिमाचल प्रदेश लंबे समय से बीबीएमबी में अपने वैधानिक अधिकारों और वित्तीय हिस्सेदारी का इंतजार कर रहा है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि राज्य सरकार अपने अधिकार हर हाल में सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि 422 मेगावाट की किशाऊ बहुउद्देश्यीय परियोजना पर हिमाचल प्रदेश तभी आगे बढ़ेगा, जब हरियाणा सरकार बीबीएमबी से जुड़े अपने हिस्से के बकाया भुगतान पर स्पष्ट सहमति देगी और इस संबंध में सर्वोच्च न्यायालय में शपथ-पत्र दाखिल करेगी। उन्होंने कहा कि जब तक हिमाचल के अधिकारों का सम्मान नहीं होता, तब तक राज्य से नई परियोजनाओं में सहयोग की अपेक्षा उचित नहीं है।
मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया कि बार-बार आग्रह के बावजूद पंजाब और हरियाणा ने हिमाचल प्रदेश को उसके वैधानिक अधिकारों से वंचित रखा है। इस पर केंद्रीय ऊर्जा मंत्री मनोहर लाल खट्टर ने आश्वासन दिया कि वह हरियाणा और पंजाब के मुख्यमंत्रियों से इस विषय पर चर्चा करेंगे और समाधान निकालने के लिए आवश्यक पहल करेंगे।
मुख्यमंत्री ने बताया कि लगभग 15 वर्ष पहले सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में हिमाचल प्रदेश को बीबीएमबी की परियोजनाओं एवं उनसे मिलने वाले लाभों में 7.19 प्रतिशत हिस्सेदारी का अधिकार दिया था। इसके बावजूद राज्य पिछले एक दशक से अधिक समय से अपने हिस्से की 13,066 मिलियन यूनिट बिजली और उससे जुड़े वित्तीय लाभों से वंचित है।
उन्होंने कहा कि प्रदेश सरकार अब सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के आधार पर बीबीएमबी से अपने हिस्से के करीब 4,200 करोड़ रुपये के बकाया की वसूली के लिए कानूनी और प्रशासनिक कार्रवाई तेज कर रही है। यह राशि हिमाचल के लोगों का वैधानिक अधिकार है और सरकार इसे हर हाल में प्राप्त करेगी।
मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि वर्ष 2023 में उन्होंने किशाऊ परियोजना से जुड़े पुराने समझौते को अस्वीकार कर दिया था, क्योंकि उसमें हिमाचल को बिजली उत्पादन लागत का बड़ा हिस्सा वहन करना पड़ता। सरकार के कड़े रुख के बाद अब राज्य को परियोजना में कोई निवेश किए बिना हर वर्ष लगभग 600 करोड़ रुपये का राजस्व मिलेगा, जिसे उन्होंने हिमाचल के अधिकारों की बड़ी जीत बताया।












