दुर्गम भौगोलिक चुनौतियों के बीच शिक्षा, स्वास्थ्य, डिजिटल कनेक्टिविटी, पर्यटन और आजीविका में नए अवसरों से बदल रही है तस्वीर
शिमला। हिमाचल प्रदेश के जनजातीय क्षेत्र- लाहौल-स्पीति, किन्नौर, पांगी और भरमौर- दशकों तक दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों, सीमित संसाधनों और लंबी बर्फबारी के कारण विकास की मुख्यधारा से अपेक्षाकृत दूर रहे। ऊंचे पर्वतीय इलाकों, कम जनसंख्या घनत्व और कठिन पहुंच ने यहां आधारभूत सुविधाओं के विस्तार को हमेशा चुनौतीपूर्ण बनाया। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में इन क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, डिजिटल कनेक्टिविटी, पर्यटन और स्वरोजगार के क्षेत्र में तेजी से बदलाव दिखाई दे रहा है।
प्रदेश के अनुसूचित क्षेत्र राज्य के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 42.49 प्रतिशत हिस्सा हैं, जबकि यहां केवल 3.92 लाख लोग निवास करते हैं, जो प्रदेश की कुल आबादी का 5.71 प्रतिशत हैं। इन क्षेत्रों का जनसंख्या घनत्व मात्र 7 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर है, जबकि प्रदेश का औसत 123 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर है। इसके बावजूद सरकार ने सभी स्थायी और मौसमी जनजातीय बस्तियों में शत-प्रतिशत विद्युतीकरण और सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराने का दावा किया है। यहां का लिंगानुपात 1,018 महिलाएं प्रति 1,000 पुरुष है, जो प्रदेश के औसत 972 से बेहतर है।
ट्राइबल सब-प्लान से विकास को गति
जनजातीय क्षेत्रों के समग्र विकास के लिए सरकार हर वर्ष अपनी विकास योजनाओं के कुल बजट का 9 प्रतिशत हिस्सा ट्राइबल सब-प्लान (एसटीपी) के तहत निर्धारित करती है। वर्ष 2024-25 में 890.28 करोड़ रुपये तथा 2025-26 में 638.73 करोड़ रुपये अनुसूचित जनजाति घटक के लिए आवंटित किए गए हैं। इन संसाधनों का उपयोग आधारभूत ढांचे, शिक्षा, स्वास्थ्य, सिंचाई, पेयजल और आजीविका संबंधी योजनाओं में किया जा रहा है।
शिक्षा में बढ़ते अवसर
जनजातीय क्षेत्रों में शिक्षा को प्राथमिकता देते हुए वर्ष 2025-26 में 3,361 विद्यार्थियों को प्री-मैट्रिक, 5,693 विद्यार्थियों को पोस्ट-मैट्रिक तथा 304 विद्यार्थियों को मेरिट छात्रवृत्ति प्रदान की गई। प्रदेश के चार एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालयों में 1,008 विद्यार्थी अध्ययनरत हैं। इन क्षेत्रों के विद्यार्थी आईआईटी, मेडिकल कॉलेज और आईआईएसईआर जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों तक पहुंच बना रहे हैं। छात्रावास, पुस्तकालय और शिक्षकों के आवास जैसी सुविधाओं का भी विस्तार किया जा रहा है।
स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार
स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत बनाने के लिए जनजातीय क्षेत्रों में दो जिला अस्पताल, छह सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, 49 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और 123 स्वास्थ्य उपकेंद्र कार्यरत हैं। इसके अलावा 568 आंगनवाड़ी केंद्र मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य तथा पोषण सेवाएं उपलब्ध करा रहे हैं।
लाहौल-स्पीति और भरमौर में स्थापित आदर्श स्वास्थ्य संस्थानों में विशेषज्ञ चिकित्सकों, एमआरआई, सीटी स्कैन, आधुनिक प्रयोगशालाओं तथा प्रशिक्षित नर्सिंग एवं पैरामेडिकल स्टाफ की उपलब्धता से दूरदराज के लोगों को अब बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं स्थानीय स्तर पर मिल रही हैं।
रोजगार और स्वरोजगार पर फोकस
जनजातीय युवाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए मुख्यमंत्री कृषि संवर्धन योजना के तहत वर्ष 2025-26 में 9,000 क्विंटल प्रमाणित बीज और 3,200 मीट्रिक टन उर्वरक वितरित किए गए। पिछले तीन वर्षों में 815 युवाओं को ग्रामीण स्वरोजगार प्रशिक्षण संस्थानों से प्रशिक्षण मिला, जिनमें से 577 युवाओं ने रोजगार प्राप्त किया या स्वयं का उद्यम शुरू किया।
वर्ष 2025-26 के दौरान 6,576 अनुसूचित जनजाति युवाओं ने रोजगार कार्यालयों में पंजीकरण कराया।
महिला सशक्तिकरण की नई तस्वीर
स्वयं सहायता समूहों और आजीविका कार्यक्रमों के माध्यम से 3,234 महिलाएं ‘लखपति दीदी’ बन चुकी हैं। वहीं पात्र महिलाओं को इंदिरा गांधी प्यारी बहना सुख सम्मान निधि योजना के तहत प्रतिमाह 1,500 रुपये की सहायता प्रदान की जा रही है, जिससे उनकी आर्थिक सुरक्षा मजबूत हुई है।
पर्यटन और हरित अर्थव्यवस्था
जनजातीय क्षेत्रों में पर्यटन आधारित अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए होम-स्टे परियोजनाओं पर पांच करोड़ रुपये तक के निवेश पर 5 प्रतिशत ब्याज अनुदान दिया जा रहा है। वहीं राजीव गांधी स्वरोजगार स्टार्ट-अप योजना के तहत निजी भूमि पर 100 किलोवाट से दो मेगावाट तक की सौर ऊर्जा परियोजनाओं के लिए भी ब्याज अनुदान उपलब्ध कराया जा रहा है।
पांगी घाटी को प्रदेश का पहला प्राकृतिक खेती उपमंडल घोषित किया गया है। यहां पांच करोड़ रुपये के रिवॉल्विंग फंड और प्राकृतिक रूप से उत्पादित जौ के लिए 80 रुपये प्रति किलोग्राम के न्यूनतम समर्थन मूल्य जैसी पहलें की गई हैं।
डिजिटल कनेक्टिविटी से बदली तस्वीर
भारतनेट परियोजना के तहत जनजातीय क्षेत्रों में 3,793 किलोमीटर ऑप्टिकल फाइबर बिछाई गई है, जिससे 705 ग्राम पंचायतें डिजिटल नेटवर्क से जुड़ चुकी हैं। इससे ई-गवर्नेंस, टेलीमेडिसिन, ऑनलाइन शिक्षा और डिजिटल बैंकिंग जैसी सेवाएं गांवों तक पहुंचने लगी हैं।
धरती आबा अभियान से समग्र विकास
धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान के तहत प्रदेश के 10 जिलों के 270 गांवों का चयन किया गया है। 17 मंत्रालयों के सहयोग से इन गांवों में 25 प्रकार के विकास हस्तक्षेप किए जा रहे हैं। हर घर नल से जल, भारतनेट, एलपीजी गैस और अन्य आधारभूत सुविधाओं का विस्तार इस अभियान का प्रमुख हिस्सा है।
संस्कृति और विकास साथ-साथ
जनजातीय क्षेत्रों में विकास के साथ-साथ सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण पर भी विशेष ध्यान दिया जा रहा है। जनजातीय संग्रहालय, सामुदायिक पुस्तकालय, सांस्कृतिक अधोसंरचना, जलागम प्रबंधन, प्राकृतिक खेती और जलवायु-अनुकूल कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देकर हिमालयी पारिस्थितिकी के संरक्षण की दिशा में भी प्रयास किए जा रहे हैं।
समावेशी विकास का मॉडल
राज्य सरकार का कहना है कि जनजातीय क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य, आधारभूत ढांचे, पर्यटन, डिजिटल कनेक्टिविटी, महिला सशक्तिकरण और सतत आजीविका के क्षेत्र में किए जा रहे निवेश से लोगों के जीवन स्तर में सुधार आया है। दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों के बावजूद इन क्षेत्रों तक विकास की पहुंच सुनिश्चित करने के प्रयास हिमाचल में समावेशी और संतुलित विकास के मॉडल के रूप में देखे जा रहे हैं।












