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AI से बदलेगी हिमाचल के जंगलों की किस्मत, ₹22,600 करोड़ की हरित अर्थव्यवस्था का दावा

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रियल-टाइम AI और सैटेलाइट मैपिंग से होगी वनों की निगरानी,
चीड़ की सूखी पत्तियों को औद्योगिक संसाधन बनाने की तैयारी
‘आपदा रक्षक’ ऐप से मिल रहे मौसम और आपदा के अलर्ट


शिमला। हिमाचल प्रदेश में अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), सैटेलाइट मैपिंग और आधुनिक तकनीक को वन एवं आपदा प्रबंधन से जोड़कर प्राकृतिक संसाधनों को आर्थिक अवसर में बदलने की तैयारी है। राज्य सरकार इस दिशा में ऐसी हरित अर्थव्यवस्था विकसित करने पर काम कर रही है, जिसकी संभावित आर्थिक क्षमता करीब ₹22,600 करोड़ बताई जा रही है।

इसके तहत जंगलों की रियल-टाइम निगरानी से लेकर वनाग्नि की रोकथाम और चीड़ की सूखी पत्तियों जैसे संसाधनों के व्यावसायिक उपयोग तक पर जोर दिया जा रहा है।


पर्यावरण, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के निदेशक एवं विशेष सचिव आपदा प्रबंधन डॉ. पुष्पेंद्र राणा के अनुसार रियल-टाइम AI और सैटेलाइट मैपिंग के माध्यम से प्रदेश के जंगलों की लगातार निगरानी संभव हो सकेगी। इससे जंगल की आग सहित विभिन्न पारिस्थितिक खतरों की समय रहते पहचान करने और प्रभावी कार्रवाई करने में मदद मिलेगी।


तकनीक आधारित इस व्यवस्था को केवल आपदा प्रबंधन तक सीमित नहीं रखा जा रहा है। इसका उद्देश्य हिमाचल के प्राकृतिक संसाधनों का वैज्ञानिक प्रबंधन करते हुए उन्हें प्रदेश की अर्थव्यवस्था से जोड़ना भी है। बेहतर डेटा और निगरानी व्यवस्था से वैश्विक जलवायु वित्त तक प्रदेश की पहुंच मजबूत करने की संभावनाएं भी तलाशी जा रही हैं।


चीड़ की सूखी पत्तियां बन सकती हैं कमाई का जरिया


हिमाचल के जंगलों में गर्मियों के दौरान चीड़ की सूखी पत्तियां वनाग्नि के प्रमुख खतरों में गिनी जाती हैं। अब इन्हीं सूखी पत्तियों को आर्थिक संसाधन के रूप में इस्तेमाल करने की संभावनाओं पर काम किया जा रहा है। डॉ. राणा के अनुसार आग के खतरे को औद्योगिक संसाधन में बदलना इस मॉडल का महत्वपूर्ण उदाहरण है। इससे एक तरफ जंगलों में आग के जोखिम को कम करने में सहायता मिल सकती है, वहीं दूसरी ओर स्थानीय स्तर पर रोजगार और आय के नए अवसर पैदा किए जा सकते हैं।


इस मॉडल के पीछे विचार यह है कि पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक विकास को एक-दूसरे के विपरीत मानने के बजाय दोनों को एक साथ आगे बढ़ाया जाए। वन क्षेत्र से निकलने वाले उपयोगी बायोमास का वैज्ञानिक और व्यावसायिक उपयोग होने पर जंगलों की सफाई तथा स्थानीय अर्थव्यवस्था दोनों को लाभ मिल सकता है।


मानसून में अब तक करीब ₹1,000 करोड़ का नुकसान


इस बीच मानसून सीजन के दौरान प्रदेश में अपेक्षाकृत कम बारिश के बावजूद प्राकृतिक आपदाओं से करीब ₹1,000 करोड़ के नुकसान का आकलन किया गया है। डॉ. पुष्पेंद्र राणा ने बताया कि कांगड़ा, लाहौल और पांगी में सबसे अधिक क्षति दर्ज की गई है। प्रदेश में करीब 130 सड़कें बंद हैं और इन्हें बहाल करने का काम लगातार किया जा रहा है।


पहाड़ी प्रदेश होने के कारण हिमाचल में भारी बारिश, भूस्खलन, फ्लैश फ्लड और सड़कें अवरुद्ध होने जैसी घटनाओं का खतरा बना रहता है। ऐसे में सरकार तकनीक के माध्यम से पूर्व चेतावनी तंत्र को मजबूत करने पर भी जोर दे रही है।


‘आपदा रक्षक’ ऐप देगा रियल-टाइम अलर्ट


लोगों तक मौसम और आपदा से जुड़ी जानकारी तेजी से पहुंचाने के लिए राज्य में ‘आपदा रक्षक’ मोबाइल ऐप शुरू किया गया है। ऐप के माध्यम से मौसम पूर्वानुमान, प्रारंभिक चेतावनी संदेश, आपदा अलर्ट और सुरक्षा संबंधी एडवाइजरी रियल-टाइम उपलब्ध कराई जा रही है।


डॉ. राणा के मुताबिक राज्य का कोई भी व्यक्ति इस ऐप को डाउनलोड कर सकता है। इसका उद्देश्य किसी संभावित आपदा से पहले लोगों को जरूरी सूचना देकर उन्हें सतर्क करना है, ताकि जान-माल के नुकसान को कम किया जा सके।


शिमला स्थित कंट्रोल सेंटर के साथ भी इसकी व्यवस्था जोड़ी गई है। कोई व्यक्ति अपने आसपास भूस्खलन, बाढ़ अथवा अन्य आपदा से संबंधित घटना की जानकारी कंट्रोल सेंटर तक पहुंचा सकता है। इससे प्रशासन को जमीनी स्थिति की सूचना मिलने और संबंधित एजेंसियों को सक्रिय करने में मदद मिल सकती है।


आपदा प्रबंधन से हरित अर्थव्यवस्था तक तकनीक पर दांव
प्रदेश सरकार की रणनीति में अब तकनीक को आपदा के बाद राहत और पुनर्बहाली तक सीमित रखने के बजाय पूर्व चेतावनी, जोखिम की पहचान, प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन और हरित अर्थव्यवस्था से जोड़ने पर जोर है।


AI आधारित निगरानी और सैटेलाइट मैपिंग से यदि जंगलों में आग के संभावित क्षेत्रों की पहले पहचान होती है और चीड़ की सूखी पत्तियों जैसे ज्वलनशील बायोमास का व्यावसायिक उपयोग बढ़ता है, तो इससे वनाग्नि के जोखिम को कम करने के साथ स्थानीय रोजगार के अवसर भी विकसित हो सकते हैं।


सरकार का दावा है कि आधुनिक तकनीक, प्राकृतिक संसाधनों के वैज्ञानिक उपयोग और जलवायु वित्त को एक साथ जोड़कर हिमाचल के लिए ₹22,600 करोड़ तक की हरित अर्थव्यवस्था की संभावनाएं विकसित की जा सकती हैं। हालांकि इस लक्ष्य की वास्तविक उपलब्धि इस बात पर निर्भर करेगी कि प्रस्तावित मॉडल को धरातल पर कितनी तेजी और किस पैमाने पर लागू किया जाता है।