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किन्नौर में पहली बार दर्ज हुआ पैसिफिक गोल्डन प्लोवर, 3800 मीटर की ऊंचाई पर मिला दुर्लभ प्रवासी पक्षी

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महेश नेगी रोनसेरू और हिमांशु चौधरी ने किया अवलोकन, किन्नौर की समृद्ध पक्षी विविधता और वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण के लिए अहम उपलब्धि

शिमला/किन्नौर। हिमाचल प्रदेश के जनजातीय जिला किन्नौर में पक्षी विविधता के लिहाज से एक महत्वपूर्ण उपलब्धि सामने आई है। जिले के कल्पा क्षेत्र में पहली बार पैसिफिक गोल्डन प्लोवर (Pluvialis fulva) की उपस्थिति दर्ज की गई है। 5 अक्टूबर, 2026 को समुद्र तल से लगभग 3,800 मीटर की ऊंचाई पर स्थित एक घास के मैदान में छोटी जलधारा के समीप इस प्रवासी पक्षी को देखा गया। पक्षी प्रेमियों और प्रकृतिविदों के इस अवलोकन को किन्नौर के पक्षी अभिलेखों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

इस पक्षी का अवलोकन कल्पा निवासी प्रकृतिविद् महेश नेगी रोनसेरू और हिमांशु चौधरी ने पुणे से आए तीन पक्षी प्रेमियों चंद्रकांत भगवत, सुधाकर कुलकर्णी और श्रीराम टकले के साथ मिलकर किया। पक्षी की शारीरिक बनावट और विशिष्ट लक्षणों के आधार पर इसकी पहचान पैसिफिक गोल्डन प्लोवर के रूप में की गई।

विशिष्ट शारीरिक लक्षणों से हुई पहचान

पक्षी की पहचान के दौरान उसके पंखों, टांगों और शरीर के निचले हिस्से की बनावट का बारीकी से निरीक्षण किया गया। इसके तृतीयक उड़ान पंख पूंछ के अंतिम सिरे तक पहुंच रहे थे और टांगें अपेक्षाकृत लंबी दिखाई दे रही थीं। इसके अलावा, शरीर का निचला हिस्सा यूरोपीय गोल्डन प्लोवर (Pluvialis apricaria) की तुलना में कम सफेद था।

इसके कंधे के पंखों पर हल्के, गोलाकार पैटर्न और उथले कटाव भी दिखाई दिए, जबकि यूरोपीय गोल्डन प्लोवर में सामान्यतः अधिक स्पष्ट और नुकीले दांतेदार पैटर्न पाए जाते हैं। इन लक्षणों के आधार पर पक्षी की पहचान की गई।

पौंग बांध और लाहौल-स्पीति में भी मिल चुके हैं रिकॉर्ड

उपलब्ध जानकारी के अनुसार, हिमाचल प्रदेश में पैसिफिक गोल्डन प्लोवर के पूर्व रिकॉर्ड पौंग बांध क्षेत्र और लाहौल-स्पीति के ट्रांस-हिमालयी इलाकों से मिले हैं। मई 2026 में पौंग बांध क्षेत्र में डॉ. अभिनव चौधरी ने इस प्रजाति का उल्लेख किया था। हालांकि, किन्नौर जिले में इसका यह पहला अभिलेखित रिकॉर्ड बताया जा रहा है।

अक्टूबर में इस पक्षी का दिखाई देना उसके दक्षिण की ओर होने वाले मौसमी प्रवास के अनुरूप है। लगभग 3,800 मीटर की ऊंचाई पर स्थित अल्पाइन घास के मैदान में एक प्रवासी पक्षी का मिलना इस बात को भी रेखांकित करता है कि प्रवास के दौरान ऊंचाई वाले क्षेत्रों में मौजूद छोटे जलस्रोत और घास के मैदान पक्षियों के लिए महत्वपूर्ण पड़ाव बन सकते हैं।

महेश नेगी रोनसेरू का वन्यजीव संरक्षण में योगदान

किन्नौर के कल्पा निवासी प्रकृतिविद् महेश नेगी रोनसेरू लंबे समय से क्षेत्र की प्राकृतिक विरासत, वन्यजीवों और जैव विविधता के दस्तावेजीकरण से जुड़े कार्यों में योगदान दे रहे हैं। उनका मानना है कि किन्नौर में आज भी कई ऐसे क्षेत्र हैं, जिनका वैज्ञानिक दृष्टिकोण से व्यवस्थित अध्ययन किया जाना बाकी है। इन क्षेत्रों में नियमित सर्वेक्षण और पक्षी अवलोकन से कई नई प्रजातियों की उपस्थिति तथा उनके वितरण से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य सामने आ सकते हैं।

उन्होंने इस अवलोकन में सहयोग के लिए हिमांशु चौधरी और डॉ. अभिनव चौधरी का आभार व्यक्त किया। प्रकृतिविदों और पक्षी प्रेमियों के अनुसार, ऐसे प्रयास न केवल क्षेत्र की जैव विविधता को समझने में मदद करते हैं, बल्कि प्रकृति पर्यटन और वन्यजीव संरक्षण की संभावनाओं को भी मजबूत करते हैं।

ट्रांस-हिमालयी जैव विविधता के अध्ययन को मिलेगी मजबूती

किन्नौर में पैसिफिक गोल्डन प्लोवर का पहला अभिलेखित रिकॉर्ड उच्च हिमालयी क्षेत्रों में पक्षियों के वितरण और प्रवास के अध्ययन के लिहाज से महत्वपूर्ण है। यह उपलब्धि दर्शाती है कि स्थानीय प्रकृतिविदों, पक्षी विशेषज्ञों और शौकिया पक्षी प्रेमियों के संयुक्त प्रयासों से हिमाचल के दूरस्थ क्षेत्रों में जैव विविधता से जुड़े नए तथ्य सामने आ सकते हैं।