ओपीएस बंद होने से बजट पर बढ़ा दबाव, मुख्यमंत्री ने ओपीएस जारी रखने की प्रतिबद्धता दोहराई
प्रदेश पर 76,633 करोड़ रुपये का कर्ज और कर्मचारियों की 10 हजार करोड़ की देनदारियां होने का किया उल्लेख
शिमला। मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू ने कहा कि प्रदेश सरकार सत्ता के लिए नहीं, बल्कि व्यवस्था परिवर्तन के संकल्प के साथ काम कर रही है। सरकार ने स्वास्थ्य, शिक्षा, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, सामाजिक सुरक्षा और आर्थिक सुधार को अपनी प्राथमिकताओं में शामिल किया है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि सत्ता संभालने के समय प्रदेश गंभीर वित्तीय चुनौतियों से गुजर रहा था। उस समय राज्य पर 76,633 करोड़ रुपये का कर्ज था और सरकारी कर्मचारियों की लगभग 10,000 करोड़ रुपये की देनदारियां थीं। इन परिस्थितियों के बावजूद सरकार ने वित्तीय अनुशासन स्थापित करने, राजस्व के नए स्रोत तलाशने और स्वास्थ्य सेवाओं को आधुनिक बनाने की दिशा में कदम उठाए हैं।
मुख्यमंत्री ने कहा कि सरकार के कार्यकाल में कई ऐसे निर्णय लिए गए, जिनका उद्देश्य प्रदेश की आर्थिक स्थिति को मजबूत करना और जनता को बेहतर सुविधाएं उपलब्ध करवाना है। उन्होंने कहा कि व्यवस्था परिवर्तन का अर्थ केवल नीतियों में बदलाव करना नहीं, बल्कि सरकारी संसाधनों का प्रभावी इस्तेमाल सुनिश्चित करना और व्यवस्था को जनता के प्रति जवाबदेह बनाना है। सरकार का प्रयास है कि हिमाचल प्रदेश अपनी आय के संसाधनों को मजबूत कर आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़े।
आरडीजी बंद होने से बजट पर बढ़ा दबाव
मुख्यमंत्री ने कहा कि राजस्व घाटा अनुदान (आरडीजी) बंद होने से हिमाचल प्रदेश की वित्तीय स्थिति पर बड़ा असर पड़ा है। प्रदेश को पहले इस मद में हर वर्ष लगभग 8,000 से 10,000 करोड़ रुपये तक की सहायता मिलती थी। कुछ वर्षों में यह राशि करीब 11,000 करोड़ रुपये तक भी रही। इस सहायता से राज्य सरकार को अपने राजस्व और व्यय के बीच के अंतर को पूरा करने में मदद मिलती थी।
उन्होंने कहा कि 16वें वित्त आयोग के समक्ष भी प्रदेश की ओर से आरडीजी जारी रखने का पक्ष रखा गया था, लेकिन अब यह सहायता बंद हो गई है। मुख्यमंत्री के अनुसार, वर्ष 2025-26 में प्रदेश का बजट लगभग 58,900 करोड़ रुपये था, जो घटकर करीब 54,000 करोड़ रुपये रह गया। ऐसी स्थिति में विकास योजनाओं, कर्मचारियों की देनदारियों और अन्य सरकारी दायित्वों के लिए संसाधन जुटाना बड़ी चुनौती है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि जीएसटी मुआवजा बंद होने और छठे वेतन आयोग की सिफारिशें लागू होने से भी राज्य पर वित्तीय दबाव बढ़ा। जीएसटी लागू होने से पहले प्रदेश को वैट और आबकारी कर से लगभग 4,000 करोड़ रुपये सालाना प्राप्त होते थे। जीएसटी व्यवस्था के बाद राज्य को हर वर्ष करीब 3,200 करोड़ रुपये का मुआवजा मिलता था, लेकिन जून 2022 में यह सहायता भी बंद हो गई।
ओपीएस पर कायम रहेगी सरकार
मुख्यमंत्री ने पुरानी पेंशन योजना (ओपीएस) को लेकर सरकार की प्रतिबद्धता दोहराते हुए कहा कि आर्थिक चुनौतियों के बावजूद सरकार अपने निर्णय से पीछे नहीं हटेगी। उन्होंने कहा कि ओपीएस लागू करने का उद्देश्य कर्मचारियों को सामाजिक सुरक्षा देना और उनके बुढ़ापे को सुरक्षित बनाना है। सरकार ने कर्मचारियों से किया गया वादा पूरा करने के लिए वित्तीय चुनौतियों का सामना किया।
सुक्खू ने कहा कि ओपीएस लागू करने के बाद प्रदेश को अतिरिक्त उधार लेने की सुविधा प्राप्त करने में भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। इसके बावजूद सरकार ने इस योजना को जारी रखने का फैसला किया। उन्होंने बताया कि इसके लिए करीब 1,600 करोड़ रुपये की व्यवस्था करने की चुनौती स्वीकार की गई।
मुख्यमंत्री ने पेंशन एरियर के भुगतान का उल्लेख करते हुए कहा कि चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों का पेंशन एरियर पूरा चुकाया जा चुका है। अन्य श्रेणियों के कर्मचारियों के एरियर का भुगतान भी किया गया है। उन्होंने कहा कि कर्मचारियों और अधिकारियों ने प्रदेश के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है और सरकार उनके योगदान का सम्मान करती है।
भाजपा सरकार के कर्ज के आंकड़ों पर उठाए सवाल
प्रदेश पर कर्ज को लेकर विपक्ष के आरोपों का जवाब देते हुए मुख्यमंत्री ने अलग-अलग सरकारों के कार्यकाल में लिए गए ऋण के आंकड़े प्रस्तुत किए। उन्होंने कहा कि वर्ष 2017-18 से 2022-23 तक भाजपा सरकार ने कुल 43,261 करोड़ रुपये के ऋण उठाए, जबकि वर्तमान कांग्रेस सरकार ने 1 अप्रैल 2023 से 22 अक्टूबर 2026 तक 37,718 करोड़ रुपये का ऋण लिया है।
मुख्यमंत्री के अनुसार, पूर्व भाजपा सरकार ने बाजार से 34,790 करोड़ रुपये, नाबार्ड से 3,530 करोड़ रुपये और राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम से 114 करोड़ रुपये का ऋण लिया था। बाह्य सहायता प्राप्त परियोजनाओं के तहत भी ऋण लिया गया। वर्तमान सरकार ने बाजार से 30,095 करोड़ रुपये, नाबार्ड से 2,642 करोड़ रुपये और बाह्य सहायता प्राप्त परियोजनाओं के तहत 526 करोड़ रुपये का ऋण उठाया।
उन्होंने कहा कि राज्य सरकार अपनी मर्जी से असीमित कर्ज नहीं ले सकती। बाजार से ऋण लेने की सीमा केंद्र सरकार का वित्त मंत्रालय निर्धारित करता है। यह सीमा राज्य के सकल घरेलू उत्पाद और निर्धारित वित्तीय मानकों के आधार पर तय होती है। भारतीय रिजर्व बैंक के माध्यम से बाजार से ऋण लेने की प्रक्रिया पूरी की जाती है और इस पर निर्धारित ब्याज भी देना पड़ता है।
मुख्यमंत्री ने भाजपा विधायक दल के नेता एवं पूर्व मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर के प्रदेश पर 1.20 लाख करोड़ रुपये का कर्ज होने संबंधी बयान पर सवाल उठाते हुए कहा कि प्रदेश पर वर्तमान में कुल 99,564 करोड़ रुपये का ऋण है। उन्होंने कहा कि ऋण के आंकड़ों को समझते समय उनकी अवधि, स्रोत और वित्तीय परिस्थितियों को ध्यान में रखना जरूरी है।
वित्तीय सुधारों से राजस्व बढ़ाने पर जोर
मुख्यमंत्री ने कहा कि सरकार ने सरकारी खरीद और अन्य व्यवस्थाओं में पारदर्शिता बढ़ाने के लिए कदम उठाए हैं। उनका कहना था कि सरकारी धन का इस्तेमाल जरूरत और निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार होना चाहिए। सरकार का प्रयास है कि अनियमितताओं पर रोक लगाकर उपलब्ध संसाधनों का बेहतर उपयोग किया जाए।
उन्होंने वाइल्डफ्लावर हॉल मामले में मिली सफलता का उल्लेख करते हुए कहा कि करीब 23 साल से चल रहे कानूनी मामले में सरकार को सफलता मिली है। मुख्यमंत्री के अनुसार, इस मामले में सरकार के खजाने में 401 करोड़ रुपये आए हैं और हर महीने लगभग 1.70 करोड़ रुपये किराये के रूप में भी मिल रहे हैं। उन्होंने इसे राज्य के लिए महत्वपूर्ण वित्तीय उपलब्धि बताया।
शराब ठेकों की आवंटन व्यवस्था में बदलाव का जिक्र करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि सरकार ने नवीनीकरण की जगह नीलामी व्यवस्था अपनाई, ताकि प्रतिस्पर्धा और पारदर्शिता बढ़े तथा राजस्व में इजाफा हो। उन्होंने कहा कि सरकार विभिन्न क्षेत्रों में आय के नए स्रोत विकसित करने पर काम कर रही है।
स्वास्थ्य सेवाओं को आधुनिक बनाने की तैयारी
मुख्यमंत्री ने स्वास्थ्य क्षेत्र में सुधार को सरकार की प्रमुख प्राथमिकताओं में शामिल बताते हुए कहा कि प्रदेश के चिकित्सा संस्थानों में कर्मचारियों की उपलब्धता बढ़ाने, आधुनिक जांच सुविधाएं उपलब्ध करवाने और मरीजों को बेहतर उपचार देने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं। सरकार का लक्ष्य है कि हिमाचल के लोगों को गंभीर बीमारियों की जांच और उपचार के लिए दूसरे राज्यों पर निर्भर न रहना पड़े।
उन्होंने कहा कि पहले मेडिकल कॉलेजों में जरूरत के मुकाबले कर्मचारियों की उपलब्धता लगभग 35 प्रतिशत थी, जो अब बढ़कर करीब 60 प्रतिशत हो गई है। सरकार ने 31 मार्च 2027 तक रिक्त पदों को भरने की दिशा में काम पूरा करने का लक्ष्य रखा है। साथ ही वर्ष 2027 तक स्टाफ की उपलब्धता को 70 प्रतिशत तक पहुंचाने की योजना है।
मुख्यमंत्री के अनुसार, मेडिकल कॉलेजों में आधुनिक जांच मशीनें स्थापित करने पर ध्यान दिया गया है। आईजीएमसी शिमला, चमियाना, नेरचौक और हमीरपुर सहित प्रमुख संस्थानों में आधुनिक एक्स-रे, अल्ट्रासाउंड, सीटी स्कैन और 3 टेस्ला एमआरआई जैसी सुविधाओं का उल्लेख किया गया। सरकार मेडिकल कॉलेजों में ऑटोमेशन लैब स्थापित करने की योजना पर भी काम कर रही है। इसके लिए प्रति लैब लगभग 28 से 30 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है।
उन्होंने रोबोटिक सर्जरी का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रदेश के चार मेडिकल कॉलेजों में यह सुविधा उपलब्ध करवाने की दिशा में काम किया गया है। सरकार के अनुसार, अब तक लगभग 600 से 700 रोबोटिक सर्जरी की जा चुकी हैं। इन सुविधाओं का उद्देश्य मरीजों को प्रदेश में ही आधुनिक उपचार उपलब्ध करवाना है।
पीजी सीटें बढ़ाने और विशेषज्ञ डॉक्टर तैयार करने पर जोर
मुख्यमंत्री ने चिकित्सा शिक्षा के विस्तार का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रदेश में पोस्ट ग्रेजुएशन की सीटें बढ़ाने की दिशा में कदम उठाए गए हैं।
उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने के लिए केवल आधुनिक मशीनें उपलब्ध करवाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि प्रशिक्षित डॉक्टरों, नर्सों, रेडियोग्राफरों और अन्य तकनीकी कर्मचारियों की उपलब्धता भी जरूरी है। इसी उद्देश्य से भर्ती प्रक्रिया और चिकित्सा संस्थानों की क्षमता बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है।
शिक्षा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था भी प्राथमिकता
मुख्यमंत्री ने कहा कि सरकार ने स्वास्थ्य के साथ शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाने पर भी ध्यान दिया है। उनका कहना था कि प्रदेश को आत्मनिर्भर बनाने के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देना और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं को प्रभावी बनाना जरूरी है।
उन्होंने कहा कि सरकार के फैसलों का उद्देश्य कर्मचारियों, किसानों, बागवानों और युवाओं के हितों की रक्षा करना है। कई बार वित्तीय अनुशासन और सुधारों के लिए कठिन निर्णय लेने पड़ते हैं, जिनका विरोध भी होता है। इसके बावजूद सरकार दीर्घकालीन हितों को ध्यान में रखकर काम कर रही है।
मुख्यमंत्री ने विश्वास जताया कि वर्ष 2030 तक हिमाचल प्रदेश स्वास्थ्य क्षेत्र में देश के अग्रणी राज्यों में शामिल होने की दिशा में आगे बढ़ेगा। शिक्षा के क्षेत्र में भी प्रदेश को बेहतर स्थान दिलाने का लक्ष्य है। उन्होंने कहा कि सरकार का उद्देश्य सत्ता में बने रहना नहीं, बल्कि प्रदेश की जनता के हित में काम करना और हिमाचल को आर्थिक रूप से मजबूत बनाना है।
इस अवसर पर स्वास्थ्य मंत्री डॉ. धनीराम शांडिल, ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज मंत्री अनिरुद्ध सिंह, विधायक हरीश जनारथा और केवल सिंह पठानिया, मुख्यमंत्री के मीडिया सलाहकार नरेश चौहान, शिमला के महापौर सुरेंद्र चौहान, मुख्य सचिव, वित्त सचिव सहित अन्य अधिकारी उपस्थित रहे।
प्रदेश पर कुल ऋण: मुख्यमंत्री के अनुसार 99,564 करोड़ रुपये
सरकार गठन के समय ऋण: 76,633 करोड़ रुपये
पूर्व भाजपा सरकार के कार्यकाल में ऋण: 43,261 करोड़ रुपये
वर्तमान सरकार के कार्यकाल में ऋण: 37,718 करोड़ रुपये
कर्मचारियों की देनदारियां: लगभग 10,000 करोड़ रुपये
वाइल्डफ्लावर हॉल मामले में प्राप्त राशि: 401 करोड़ रुपये
वाइल्डफ्लावर हॉल से मासिक किराया: लगभग 1.70 करोड़ रुपये
ओपीएस लागू करने के लिए बताई गई व्यवस्था: लगभग 1,600 करोड़ रुपये
आरडीजी बंद होने का असर
हिमाचल को पहले आरडीजी के रूप में सालाना लगभग 8,000 से 10,000 करोड़ रुपये मिलते थे।
कुछ वर्षों में यह सहायता लगभग 11,000 करोड़ रुपये तक रही।
मुख्यमंत्री के अनुसार, वर्ष 2025-26 का बजट लगभग 58,900 करोड़ रुपये था, जो घटकर करीब 54,000 करोड़ रुपये रह गया।
जीएसटी मुआवजा जून 2022 में बंद हो गया था।
सरकार के सामने विकास कार्यों और वित्तीय दायित्वों के लिए संसाधन जुटाने की चुनौती बढ़ी है।
स्वास्थ्य क्षेत्र में सरकार के लक्ष्य
मेडिकल कॉलेजों में स्टाफ की उपलब्धता 35 प्रतिशत से बढ़कर लगभग 60 प्रतिशत होने का दावा।
31 मार्च 2027 तक रिक्त पद भरने का लक्ष्य।
वर्ष 2027 तक स्टाफ की उपलब्धता 70 प्रतिशत तक पहुंचाने की योजना।
ऑटोमेशन लैब पर प्रति संस्थान लगभग 28 से 30 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान।
चार मेडिकल कॉलेजों में रोबोटिक सर्जरी की सुविधा का उल्लेख।
पीजी की 277 मौजूदा सीटों के मुकाबले 320 अतिरिक्त सीटों को मंजूरी मिलने का दावा।











