हिमाचल-उत्तराखंड सीमा पर टोंस नदी में बनेगा 232.6 मीटर ऊंचा बांध, 1562 एमसीएम जल भंडारण; राष्ट्रीय परियोजना का 90 फीसदी खर्च केंद्र उठाएगा
शिमला। करीब चार दशक से लंबित किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना को मंगलवार को बड़ी गति मिली। केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह और केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सीआर पाटिल की मौजूदगी में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, दिल्ली और हरियाणा के मुख्यमंत्रियों ने किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना समझौते पर हस्ताक्षर किए। हिमाचल प्रदेश की ओर से मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने समझौते पर हस्ताक्षर किए। छह राज्यों की सहमति के बाद अब परियोजना के निर्माण का रास्ता काफी हद तक साफ हो गया है।
परियोजना हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड की सीमा पर टोंस नदी पर प्रस्तावित है। यहां 232.6 मीटर ऊंचा कंक्रीट ग्रेविटी डैम बनाया जाएगा, जिसमें करीब 1562 मिलियन क्यूबिक मीटर (एमसीएम) पानी का भंडारण होगा। परियोजना से करीब 97 हजार हेक्टेयर भूमि की सिंचाई और 1476 मिलियन यूनिट स्वच्छ जलविद्युत उत्पादन का लक्ष्य है। इसके अलावा यमुना बेसिन के छह राज्यों को जल उपलब्धता का लाभ मिलेगा।
हिमाचल के लिए बिजली और जल संसाधन की दृष्टि से अहम
किशाऊ परियोजना हिमाचल के लिए विशेष महत्व रखती है, क्योंकि प्रस्तावित बांध प्रदेश की सीमा से जुड़े टोंस नदी क्षेत्र में बनेगा। परियोजना के पूरा होने से हिमाचल को समझौते के तहत बिजली में हिस्सेदारी मिलने के साथ क्षेत्र में जल संसाधनों के बेहतर उपयोग का अवसर मिलेगा। राष्ट्रीय परियोजना का दर्जा मिलने के कारण परियोजना के वित्तीय बोझ का बड़ा हिस्सा केंद्र सरकार उठाएगी। केंद्र करीब 90 फीसदी लागत वहन करेगा, जबकि शेष 10 फीसदी राशि भागीदार राज्यों को 1994 के समझौते के अनुसार वहन करनी होगी।
1994 के समझौते से अब तक अटकी रही थी परियोजना
किशाऊ परियोजना को लेकर छह राज्यों के बीच लंबे समय से सहमति नहीं बन पा रही थी। 12 मई 1994 को हुए समझौते में यमुना बेसिन की भंडारण परियोजनाओं के लिए अलग-अलग समझौतों का प्रावधान किया गया था। बाद में लखवार और रेणुकाजी बहुउद्देशीय परियोजनाओं से जुड़े विवाद सुलझने के बाद किशाऊ परियोजना को आगे बढ़ाने की जमीन तैयार हुई। केंद्र के अनुसार, बीते 16 जून को परियोजना पर औपचारिक सहमति बनने के बाद तकनीकी और आर्थिक पहलुओं पर राज्यों के साथ चर्चा कर मंगलवार को समझौते को अंतिम रूप दिया गया।
यमुना के पर्यावरणीय प्रवाह में भी होगी मदद
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने समझौते को यमुना और दिल्ली के लिए भी महत्वपूर्ण बताया। उनके अनुसार, यमुना जल बंटवारे के समय नदी के पर्यावरणीय प्रवाह को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया और उपलब्ध पानी का राज्यों के बीच बंटवारा कर दिया गया। किशाऊ परियोजना से मिलने वाले पानी में से 25 फीसदी जल यमुना के लिए उपलब्ध होगा, जिससे दिल्ली की जल जरूरतों के साथ यमुना के पर्यावरणीय प्रवाह को भी मजबूती मिलने की उम्मीद है।
छह राज्यों को अलग-अलग रूप में मिलेगा लाभ
परियोजना से हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली लाभान्वित होंगे। सिंचाई, पेयजल, औद्योगिक उपयोग और बिजली उत्पादन के साथ यमुना बेसिन में जल उपलब्धता बढ़ेगी। केंद्र सरकार ने इसे राष्ट्रीय परियोजना घोषित किया है, जिससे इसके क्रियान्वयन में राज्यों पर पड़ने वाला वित्तीय दबाव भी कम होगा।
जल विवादों के समाधान को लेकर केंद्र का दावा
अमित शाह ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में 2018 से 2026 के बीच कई पुराने अंतरराज्यीय जल विवादों को आपसी सहमति से सुलझाया गया है। उन्होंने किशाऊ समझौते को इसी प्रक्रिया की कड़ी बताते हुए इसे ‘टीम भारत’ और ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास’ की भावना का उदाहरण बताया। केंद्रीय गृह मंत्री ने परियोजना को शीघ्र पूरा करने के लिए सभी छह राज्यों के मुख्यमंत्रियों और जल शक्ति मंत्रालय के प्रयासों की सराहना की












