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नए मुख्यमंत्री कार्यालय को लेकर सुधीर शर्मा का सरकार पर हमला

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50 करोड़ कार्यालय के लिए, विश्वविद्यालय कैंपस के लिए 20 करोड़ नहीं


कहा-आर्थिक तंगी के बीच सरकार को तय करनी चाहिए प्राथमिकताएं, ऐसी स्थिति न बने कि प्रदेश की पहचान ही खतरे में पड़ जाए


शिमला। मुख्यमंत्री के नए कार्यालय के निर्माण को लेकर भाजपा विधायक सुधीर शर्मा ने प्रदेश सरकार पर निशाना साधा है। उन्होंने कार्यालय के निर्माण पर खर्च होने वाली राशि पर सवाल उठाते हुए कहा कि एक ओर सरकार आर्थिक संसाधनों की कमी का हवाला दे रही है, वहीं मुख्यमंत्री कार्यालय के लिए करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं।


सुधीर शर्मा ने तंज कसते हुए कहा कि प्रदेशवासियों को बधाई है कि सचिवालय में मुख्यमंत्री को नया कार्यालय मिलने जा रहा है। उन्होंने दावा किया कि नए कार्यालय के निर्माण पर करीब 50 करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं। उनका कहना था कि प्रदेश के इतिहास में किसी मुख्यमंत्री कार्यालय पर इतनी बड़ी राशि खर्च किए जाने का उदाहरण नहीं रहा है।


उन्होंने कहा कि सरकार को आर्थिक स्थिति को देखते हुए अपनी प्राथमिकताएं तय करनी चाहिए। सुधीर शर्मा ने कहा कि एक तरफ नए मुख्यमंत्री कार्यालय के लिए 50 करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं, जबकि दूसरी ओर केंद्रीय विश्वविद्यालय के नॉर्थ कैंपस के निर्माण के लिए 20 करोड़ रुपये उपलब्ध करवाने में सरकार असमर्थता जता रही है।


भाजपा विधायक ने सवाल उठाया कि शिक्षा और विकास से जुड़े महत्वपूर्ण संस्थानों के लिए धन की कमी क्यों बताई जा रही है, जबकि मुख्यमंत्री कार्यालय के निर्माण पर इतनी बड़ी राशि खर्च की जा रही है। उन्होंने सरकार से विकास कार्यों और शिक्षा से जुड़े प्रोजेक्ट्स को प्राथमिकता देने की मांग की।


फर्नीचर की कीमतों पर भी उठाए सवाल


सुधीर शर्मा ने नए मुख्यमंत्री कार्यालय में लगाए जा रहे फर्नीचर को लेकर भी सवाल उठाए। उन्होंने दावा किया कि कार्यालय में लगाए गए कुछ सोफों की कीमत 6 से 7 लाख रुपये प्रति सोफा तक बताई जा रही है और इनके बाकायदा बिल बनाए गए हैं। उन्होंने सरकार से इन खर्चों का ब्यौरा सार्वजनिक करने को कहा।


सुधीर शर्मा ने प्रदेश की आर्थिक स्थिति पर चिंता जताते हुए कहा कि सरकार को ऐसे हालात पैदा नहीं करने चाहिए, जिनमें आने वाले समय में प्रदेश के पास विकास के लिए पर्याप्त संसाधन ही न बचें। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि ऐसी परिस्थिति नहीं बननी चाहिए कि “प्रदेश, प्रदेश न रहे, कहीं केंद्र शासित प्रदेश न बन जाए।”


उन्होंने सरकार से मुख्यमंत्री कार्यालय सहित अन्य परियोजनाओं पर होने वाले खर्च में पारदर्शिता बरतने और प्रदेश के सीमित वित्तीय संसाधनों का इस्तेमाल जनहित एवं विकास कार्यों के लिए प्राथमिकता के आधार पर करने की मांग की।