विश्वविद्यालय में वित्तीय व प्रशासनिक अनियमितताओं की जांच, सीएएस, शिक्षकों की नियुक्तियों, ईआरपी परियोजना और प्रत्यक्ष छात्रसंघ चुनाव बहाल करने की मांग
शिमला। हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय (एचपीयू) के 57वें स्थापना दिवस के अवसर पर स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (एसएफआई) ने विश्वविद्यालय में पारदर्शिता, जवाबदेही और उच्च शिक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग को लेकर मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू को विस्तृत ज्ञापन सौंपा। संगठन ने कहा कि स्थापना दिवस केवल उत्सव का अवसर नहीं, बल्कि विश्वविद्यालय की कार्यप्रणाली और भविष्य की दिशा पर आत्ममंथन का भी समय है।
एसएफआई ने कहा कि पिछले 57 वर्षों में विश्वविद्यालय ने प्रदेश को हजारों विद्यार्थी, शोधार्थी, शिक्षक, प्रशासक और सामाजिक कार्यकर्ता दिए हैं। ऐसे में इसकी गरिमा, विश्वसनीयता और लोकतांत्रिक चरित्र को बनाए रखना सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है।
ज्ञापन में विश्वविद्यालय में पारदर्शिता, वित्तीय जवाबदेही, प्रशासनिक सुधार तथा उच्च शिक्षा व्यवस्था से जुड़े विभिन्न मामलों की निष्पक्ष और समयबद्ध जांच की मांग की गई। संगठन का आरोप है कि विश्वविद्यालय लगातार आर्थिक संकट का हवाला देकर विद्यार्थियों पर फीस वृद्धि का बोझ डाल रहा है, जबकि सूचना के अधिकार (आरटीआई), नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की रिपोर्ट तथा विश्वविद्यालय के अभिलेख वित्तीय और प्रशासनिक अनियमितताओं की ओर संकेत करते हैं। एसएफआई ने कहा कि विद्यार्थियों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डालने से पहले सार्वजनिक धन के उपयोग की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
संगठन ने निजी और सरकारी महाविद्यालयों के निरीक्षण की प्रक्रिया को पूरी तरह पारदर्शी बनाने की मांग करते हुए कहा कि निरीक्षण निर्धारित मानकों के अनुरूप हो तथा किसी भी प्रकार के भ्रष्टाचार या पक्षपात की संभावना समाप्त की जाए।
एसएफआई ने विभागाध्यक्षों की नियुक्तियों में समान नीति लागू करने की मांग भी उठाई। संगठन का कहना है कि यदि किसी विभाग में सहायक आचार्य को विभागाध्यक्ष का दायित्व सौंपा जा सकता है तो अन्य विभागों में भी समान सिद्धांत लागू किए जाने चाहिए और प्रशासनिक निर्णय चयनात्मक नहीं होने चाहिए।
ज्ञापन में हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय अधिनियम, 1970 की धारा 2(15) के कथित उल्लंघन का मुद्दा भी उठाया गया।
एसएफआई ने आरोप लगाया कि शिक्षक की परिभाषा से जुड़े मामलों में समानता के सिद्धांत का पालन नहीं किया गया और इसकी निष्पक्ष जांच कराई जानी चाहिए।
संगठन ने कैरियर एडवांसमेंट स्कीम (सीएएस) में कथित अनियमितताओं की न्यायिक जांच की मांग दोहराते हुए कहा कि यूजीसी विनियम-2010 के विपरीत पदोन्नतियां, पूर्व सेवाओं की गणना और एरियर भुगतान जैसे मामलों की स्वतंत्र जांच कर जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए। साथ ही एक ही एपीआई (Academic Performance Indicator) के आधार पर भर्ती और पदोन्नति तथा कम समय में सहायक आचार्य से प्रोफेसर तक पदोन्नति के मामलों की भी जांच की मांग की गई।
एसएफआई ने वर्ष 2020 के बाद हुई लगभग 186 शिक्षकों की नियुक्तियों पर भी सवाल उठाए। संगठन का कहना है कि उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार कई मामलों में शैक्षणिक योग्यता, अनुभव, आरक्षण रोस्टर, ओबीसी एवं ईडब्ल्यूएस प्रमाणपत्रों तथा नेट छूट से जुड़े प्रश्न सामने आए हैं। हालांकि संगठन ने स्पष्ट किया कि वह किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहरा रहा, बल्कि इन सभी मामलों की स्वतंत्र न्यायिक जांच की मांग कर रहा है।
संगठन ने विश्वविद्यालय में प्रत्यक्ष छात्रसंघ चुनाव बहाल करने की मांग भी उठाई।
एसएफआई का कहना है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में छात्रों के अधिकारों की रक्षा आवश्यक है और हिमाचल प्रदेश में छात्रों के लोकतांत्रिक अधिकारों पर अंकुश लगाया गया है। इसलिए प्रत्यक्ष छात्रसंघ चुनाव जल्द बहाल किए जाने चाहिए।
ज्ञापन में विश्वविद्यालय के निर्माण कार्यों और ईआरपी परियोजना में संभावित वित्तीय अनियमितताओं की जांच की मांग भी की गई। एसएफआई ने कहा कि विभिन्न निर्माण परियोजनाओं की लागत में हुई वृद्धि तथा करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद ईआरपी प्रणाली के पूरी तरह लागू नहीं होने के मामले गंभीर चिंता का विषय हैं। उत्तर पुस्तिकाओं की स्कैनिंग प्रक्रिया को लेकर भी परीक्षा प्रणाली की गोपनीयता पर सवाल उठ रहे हैं, जिनकी तकनीकी और वित्तीय जांच आवश्यक है।
एसएफआई ने मुख्यमंत्री से आग्रह किया कि विश्वविद्यालय की स्वायत्तता, पारदर्शिता और शैक्षणिक गुणवत्ता को मजबूत करने के लिए इन सभी मामलों की निष्पक्ष एवं समयबद्ध जांच सुनिश्चित की जाए तथा दोषी पाए जाने वालों के विरुद्ध आवश्यक कार्रवाई की जाए। संगठन ने कहा कि सार्वजनिक धन की सुरक्षा, विद्यार्थियों के हितों की रक्षा और विश्वविद्यालय की गरिमा बनाए रखने के लिए जवाबदेही तय होना आवश्यक है।
एसएफआई विश्वविद्यालय इकाई सचिव मुकेश और इकाई उपाध्यक्ष आशीष चौहान ने कहा कि संगठन भविष्य में भी विद्यार्थियों, शोधार्थियों तथा विश्वविद्यालय के लोकतांत्रिक और शैक्षणिक हितों की रक्षा के लिए संघर्ष जारी रखेगा।












