संवेदनशील इलाके बनेंगे ‘नो कंस्ट्रक्शन जोन’, जाखू हिल्स समेत कई क्षेत्रों में सख्ती; सरकार लाई पहाड़ों को बचाने का नया ब्लूप्रिंट
शिमला। हिमाचल प्रदेश में अनियंत्रित निर्माण, भूस्खलन और प्राकृतिक आपदाओं पर लगाम लगाने के लिए राज्य सरकार अब सबसे बड़ा नियामकीय कदम उठाने जा रही है। नगर एवं ग्राम नियोजन (टीसीपी), आवास तथा व्यावसायिक एवं औद्योगिक प्रशिक्षण मंत्री राजेश धर्माणी ने खुलासा किया है कि प्रदेश के संवेदनशील क्षेत्रों को चरणबद्ध तरीके से ‘नो कंस्ट्रक्शन जोन’ घोषित किया जाएगा, जबकि राष्ट्रीय राजमार्गों और फोरलेन के दोनों ओर 50 से 100 मीटर तक के क्षेत्र को ‘प्लानिंग एरिया’ के रूप में अधिसूचित कर निर्माण गतिविधियों को सख्ती से नियंत्रित किया जाएगा
सरकार का मानना है कि यदि अभी भी बिना योजना के निर्माण पर रोक नहीं लगी, तो हिमाचल की प्राकृतिक पहचान, पर्यटन और लोगों की सुरक्षा तीनों पर गंभीर खतरा पैदा हो सकता है।
शिमला के जाखू हिल्स पर विशेष सुरक्षा कवच
सरकार ने राजधानी शिमला के सबसे संवेदनशील क्षेत्र जाखू हिल्स को विशेष संरक्षण देने का फैसला किया है। प्रस्तावित संरक्षित क्षेत्र में संजौली-आईजीएमसी रोड, रानी झांसी पार्क, मेट्रोपोल से ओकओवर तक का ऊपरी पहाड़ी क्षेत्र शामिल होगा। यहां निर्माण गतिविधियों को सख्ती से नियंत्रित किया जाएगा ताकि हरित आवरण और प्राकृतिक ढलानों को सुरक्षित रखा जा सके।
बिना मास्टर प्लान निर्माण पर लगेगी रोक
सरकार पूरे प्रदेश में बिना मास्टर प्लान के हो रहे निर्माण पर रोक लगाने की तैयारी में है। नए नियमों के तहत किसी भी क्षेत्र में निर्माण को वैज्ञानिक योजना, भूगर्भीय सुरक्षा और पर्यावरणीय मानकों के आधार पर ही अनुमति मिलेगी।
हाईवे और सड़कों के किनारे नए नियम
नई नीति के तहत-
नेशनल हाईवे और फोरलेन के दोनों ओर 50-100 मीटर क्षेत्र ‘प्लानिंग एरिया’ होगा।
ग्रामीण सड़कों के किनारे कम से कम एक मीटर का ‘नो कंस्ट्रक्शन जोन’ रहेगा।
सड़क से सटाकर भवन निर्माण पर प्रभावी रोक लगाई जाएगी।
भविष्य में सड़क चौड़ीकरण, ड्रेनेज, सीवरेज, बिजली और पैदल मार्ग विकसित करने में आसानी होगी।
आपदा संभावित क्षेत्रों में निर्माण पूरी तरह प्रतिबंधित
राज्य सरकार ने उन क्षेत्रों की पहचान शुरू कर दी है जहां प्राकृतिक आपदाओं का खतरा अधिक रहता है। इनमें—
भूस्खलन संभावित क्षेत्र,
प्राकृतिक जलधाराओं (वॉटर कोर्स) के रास्ते,
फ्लडिंग जोन,
पुरानी डंपिंग साइट्स,
अन्य भू-वैज्ञानिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र शामिल हैं।
इन सभी स्थानों को ‘नो कंस्ट्रक्शन जोन’ घोषित करने की योजना है ताकि भविष्य में जान-माल के नुकसान को कम किया जा सके।
हर शहर में विकसित होंगे ‘अर्बन फॉरेस्ट’
सरकार पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देने के लिए शहरों में ‘अर्बन फॉरेस्ट’ (शहरी जंगल) विकसित करने की भी तैयारी कर रही है। इसके लिए उपयुक्त भूमि चिन्हित की जा रही है।
ग्राम पंचायतें तय करेंगी खतरनाक इलाके
नई व्यवस्था में ग्राम पंचायतों की भूमिका भी अहम होगी। सरकार सभी पंचायतों को विशेष एजेंडा भेजेगी, जिसके आधार पर पंचायतें अपने क्षेत्रों में आपदा संभावित स्थानों की पहचान कर उन्हें ‘नो कंस्ट्रक्शन जोन’ घोषित करने का प्रस्ताव पारित कर सकेंगी। इस प्रक्रिया में पंचायती राज एवं ग्रामीण विकास विभाग भी सहयोग करेगा।
‘नो कंस्ट्रक्शन जोन’ में आने वाली जमीन खरीदेगी सरकार
राजेश धर्माणी ने स्पष्ट किया कि सरकार का उद्देश्य विकास रोकना नहीं, बल्कि लोगों की जान और संपत्ति की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। उन्होंने कहा कि जिन लोगों की जमीन ‘नो कंस्ट्रक्शन जोन’ में आएगी, उन्हें चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। सरकार ऐसी जमीन सर्कल रेट के आधार पर खरीदने का विकल्प भी उपलब्ध कराएगी।
इस नीति का बड़ा संदेश….
लगातार बढ़ रही प्राकृतिक आपदाओं, भूस्खलन और बेतरतीब शहरीकरण के बीच हिमाचल सरकार पहली बार निर्माण नियंत्रण, पर्यावरण संरक्षण और आपदा जोखिम प्रबंधन को एकीकृत नीति के रूप में लागू करने की तैयारी में है। यदि यह प्रस्ताव लागू होता है, तो आने वाले वर्षों में प्रदेश में निर्माण गतिविधियों के नियम पूरी तरह बदल सकते हैं और हिमाचल के विकास मॉडल में बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा।











