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हिमाचल में GLOF से निपटने के लिए ₹105 करोड़ का प्रस्ताव, गैपांग झील पर जल्द लगेगा अर्ली वार्निंग सिस्टम

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केंद्र की हाईलेवल बैठक में हिमाचल ने उठाए अहम मुद्दे, 681 ग्लेशियल झीलों का होगा फ्लो-पाथ और डाउनस्ट्रीम रिस्क असेसमेंट
तिब्बती हिमालय क्षेत्र की 59 झीलों को लेकर अंतरराष्ट्रीय समन्वय की मांग


शिमला। हिमालयी राज्यों में ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) के खतरे से निपटने और आपदा से पहले तैयारियों को मजबूत करने के लिए केंद्रीय गृह सचिव की अध्यक्षता में उच्चस्तरीय बैठक आयोजित की गई। बैठक में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA), केंद्रीय जल आयोग (CWC) और हिमालयी राज्यों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। हिमाचल प्रदेश ने बैठक में अर्ली वार्निंग सिस्टम और GLOF शमन उपायों के लिए तैयार किए गए करीब 105 करोड़ रुपये के डीपीआर समेत कई अहम मुद्दे उठाए।


हिमाचल के जल शक्ति विभाग ने ग्लेशियल झीलों से संभावित खतरे को कम करने के लिए अर्ली वार्निंग सिस्टम (EWS) स्थापित करने और अन्य GLOF शमन उपायों को लागू करने के लिए लगभग 105 करोड़ रुपये का विस्तृत परियोजना प्रतिवेदन (DPR) तैयार किया है। इस प्रस्ताव को वित्तीय सहायता के लिए NDMA के समक्ष रखा जाएगा।


प्रदेश ने यह भी आग्रह किया कि परियोजना को लागू करने से पहले केंद्रीय जल आयोग (CWC) और NDMA से DPR की तकनीकी समीक्षा करवाई जाए। इसके बाद जल शक्ति विभाग द्वारा EoI प्रक्रिया के माध्यम से चिन्हित एजेंसियों के जरिये कार्यान्वयन किया जाएगा।


तिब्बती क्षेत्र की झीलों को लेकर अंतरराष्ट्रीय समन्वय की मांग
बैठक में हिमाचल ने तिब्बती हिमालय क्षेत्र में स्थित ग्लेशियल झीलों को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समन्वय की आवश्यकता भी उठाई। प्रदेश के अनुसार 10 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्रफल वाली 76 ग्लेशियल झीलों में से 59 तिब्बती हिमालय क्षेत्र में आती हैं।

ऐसे में इन झीलों से जुड़े संभावित जोखिमों की निगरानी और समय रहते चेतावनी के लिए अंतरराष्ट्रीय समन्वय जरूरी है।
इसके साथ ही हिमाचल ने गैपांग झील में अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित करने की मंजूरी जल्द से जल्द देने का आग्रह किया, ताकि झील से जुड़े संभावित खतरे की स्थिति में डाउनस्ट्रीम क्षेत्रों को समय रहते अलर्ट किया जा सके।


681 ग्लेशियल झीलों का होगा व्यापक जोखिम आकलन


बैठक में देशभर में चिन्हित 681 ग्लेशियल झीलों को लेकर व्यापक स्तर पर जोखिम आकलन करने का निर्णय लिया गया। केंद्रीय जल आयोग इन सभी झीलों के लिए फ्लो-पाथ एनालिसिस और डाउनस्ट्रीम रिस्क असेसमेंट करेगा। इसके आधार पर NDMA के नेतृत्व में एक एकीकृत जोखिम-वर्गीकरण (Risk Categorisation) ढांचा विकसित किया जाएगा।


केंद्र सरकार ने GLOF से निपटने के लिए दीर्घकालिक वित्त पोषण और जोखिम न्यूनीकरण कार्यक्रम विकसित करने का भी निर्णय लिया है। इसमें लेक-टू-लेक अप्रोच अपनाते हुए चरणबद्ध तरीके से सभी 681 झीलों को एक व्यापक कार्यक्रम में शामिल किया जाएगा। तकनीकी समन्वय और तैयारियों को मजबूत करने के लिए एक समर्पित GLOF वर्कशॉप भी आयोजित की जाएगी।
ISRO और C-DAC की कनेक्टिविटी का मुद्दा भी केंद्र के स्तर पर उठेगा


ग्लेशियल झीलों की निगरानी और अर्ली वार्निंग सिस्टम के लिए आवश्यक ISRO और C-DAC की डेटा/बैंडविड्थ कनेक्टिविटी से जुड़े मुद्दों को गृह मंत्रालय के स्तर पर उठाने का फैसला भी बैठक में लिया गया।


बैठक का व्यापक उद्देश्य अलग-अलग झीलों की निगरानी तक सीमित रहने के बजाय हिमालयी राज्यों के लिए एकीकृत और तकनीक आधारित GLOF प्रबंधन प्रणाली विकसित करना है। इसमें जोखिम आकलन, अर्ली वार्निंग, शमन उपायों और डाउनस्ट्रीम क्षेत्रों की आपदा तैयारी को एक ही समग्र व्यवस्था से जोड़ने पर जोर दिया गया।