शिमला में CPIM के ‘जेल भरो आंदोलन’ ने खड़े किए बड़े सवाल, BNSS की धारा-163 लागू क्षेत्र में जुटे प्रदर्शनकारी; पुलिस कार्रवाई के बजाय बनी रही मूकदर्शक
शिमला। हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला में सोमवार शाम CPIM के नेतृत्व में हुए प्रदर्शन ने पुलिस कार्रवाई और प्रशासनिक रणनीति को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के खिलाफ नारेबाजी करते हुए विभिन्न संगठनों के नेता और कार्यकर्ता शिमला पुलिस रिपोर्टिंग रूम के बाहर पहुंच गए।
प्रदर्शनकारियों का दावा था कि वे ‘जेल भरो आंदोलन’ के तहत गिरफ्तारी देने पहुंचे हैं। हालांकि, करीब एक घंटे तक नारेबाजी और प्रदर्शन के बावजूद पुलिस ने किसी भी प्रदर्शनकारी को गिरफ्तार नहीं किया।
मामला इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि प्रदर्शन का स्थान ऐसा क्षेत्र है, जहां BNSS की धारा-163 के तहत चार या उससे अधिक लोगों के एकत्रित होने तथा सार्वजनिक तौर पर नारेबाजी आदि पर प्रतिबंध लागू रहता है। इसके बावजूद सोमवार शाम करीब 5:10 बजे CPIM सहित विभिन्न संगठनों के सैकड़ों कार्यकर्ता पुलिस रिपोर्टिंग रूम के बाहर एकत्रित हुए। प्रदर्शनकारियों ने केंद्र सरकार के खिलाफ जमकर नारेबाजी की और अपने आंदोलन के समर्थन में आवाज बुलंद की।
गिरफ्तारी देने पहुंचे थे, लेकिन कार्रवाई नहीं हुई
प्रदर्शन के दौरान सबसे दिलचस्प स्थिति यह रही कि प्रदर्शनकारी खुद गिरफ्तारी देने की बात कहते हुए पुलिस के सामने पहुंचे, लेकिन पुलिस की ओर से किसी को हिरासत में नहीं लिया गया। करीब एक घंटे तक प्रदर्शन और नारेबाजी का दौर चलता रहा। इसके बाद भी पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार करने या उन्हें मौके से हिरासत में लेकर हटाने की कार्रवाई नहीं की।
इस घटनाक्रम ने पुलिस की रणनीति को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। सामान्य तौर पर प्रतिबंधित क्षेत्र में बड़ी संख्या में लोगों के एकत्रित होने की स्थिति में पुलिस प्रशासन की ओर से कार्रवाई की उम्मीद की जाती है। लेकिन सोमवार को शिमला पुलिस ने अलग रणनीति अपनाई।
विजेंद्र मेहरा बोले, जेल भरो आंदोलन की शुरुआत के लिए पहुंचे थे
CITU के राज्य अध्यक्ष विजेंद्र मेहरा ने आंदोलन को सफल बताते हुए कहा कि कार्यकर्ता जेल भरो आंदोलन की शुरुआत करने के लिए यहां पहुंचे थे। उन्होंने पुलिस प्रबंधों को भी नाकाफी बताया।
मेहरा के अनुसार, आंदोलन में गिरफ्तारी देने के लिए सैकड़ों की संख्या में लोग पहुंचे थे, जबकि पुलिस के पास प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लेने के लिए केवल एक वाहन मौजूद था। उन्होंने दावा किया कि बड़ी संख्या में लोगों की मौजूदगी के बावजूद पुलिस व्यवस्था पर्याप्त नहीं थी और इसी वजह से आंदोलनकारियों का प्रदर्शन प्रभावी रहा।
धारा-163 वाले क्षेत्र में प्रदर्शन, फिर भी क्यों नहीं हुई गिरफ्तारी?
सोमवार के घटनाक्रम का सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब संबंधित क्षेत्र में चार या उससे अधिक लोगों के एकत्रित होने पर प्रतिबंध लागू है, तो फिर बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी वहां कैसे पहुंचे और करीब एक घंटे तक प्रदर्शन कैसे चलता रहा?
दूसरा सवाल यह है कि जब प्रदर्शनकारी स्वयं गिरफ्तारी देने के लिए पुलिस रिपोर्टिंग रूम के बाहर पहुंचे थे, तो पुलिस ने किसी को गिरफ्तार क्यों नहीं किया? क्या पुलिस ने जानबूझकर टकराव से बचने की रणनीति अपनाई या फिर प्रदर्शन को सीमित दायरे में रखते हुए स्थिति को नियंत्रित करने का निर्णय लिया गया?
सरकार मामले को तूल नहीं देना चाहती थी?
घटनाक्रम के बाद राजनीतिक हलकों में यह चर्चा भी शुरू हो गई है कि क्या सरकार और प्रशासन इस मामले को ज्यादा तूल नहीं देना चाहते थे। हालांकि, सरकार या पुलिस की ओर से ऐसी किसी रणनीति की आधिकारिक पुष्टि सामने नहीं आई है। इसलिए इसे फिलहाल केवल राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में उठ रहे सवाल के तौर पर ही देखा जा रहा है।
फिर भी सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि प्रदर्शनकारी खुले तौर पर गिरफ्तारी देने की घोषणा कर मौके पर पहुंचे थे। ऐसे में पुलिस द्वारा गिरफ्तारी नहीं किए जाने से आंदोलन की प्रकृति और प्रशासन की प्रतिक्रिया दोनों पर चर्चा शुरू हो गई है।
पुलिस की रणनीति या सरकार का राजनीतिक संदेश?
शिमला के इस घटनाक्रम ने एक तरफ पुलिस की कानून-व्यवस्था संबंधी रणनीति पर सवाल खड़े किए हैं, तो दूसरी तरफ राजनीतिक संदेश को लेकर भी चर्चाएं तेज कर दी हैं। क्या पुलिस ने जानबूझकर गिरफ्तारी से बचते हुए स्थिति को शांतिपूर्ण बनाए रखने का फैसला किया? क्या बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लेने के लिए पर्याप्त पुलिस संसाधन उपलब्ध नहीं थे? या फिर प्रशासन ने राजनीतिक टकराव बढ़ने की आशंका को देखते हुए गिरफ्तारी नहीं करने का निर्णय लिया?इन सवालों के जवाब पुलिस और प्रशासन की ओर से सामने आने के बाद ही तस्वीर पूरी तरह साफ होगी।
फिलहाल शिमला में सोमवार शाम का यह प्रदर्शन इस वजह से चर्चा में है कि गिरफ्तारी देने के लिए पहुंचे सैकड़ों प्रदर्शनकारी करीब एक घंटे तक नारे लगाते रहे, लेकिन पुलिस ने किसी को गिरफ्तार नहीं किया। ऐसे में अब निगाहें इस बात पर हैं कि पुलिस इस घटनाक्रम को लेकर आगे क्या स्पष्टीकरण देती है और क्या प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई की जाती है।











