गुलजारीलाल नंदा फाउंडेशन की समीक्षा में 858 हैंगिंग ग्लेशियर चिन्हित, सरकार से तत्काल वैज्ञानिक निगरानी और सुरक्षा उपाय लागू करने की अपील
शिमला। हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने और ग्लेशियर झीलों के बढ़ते आकार ने भविष्य में बड़ी प्राकृतिक आपदाओं का खतरा बढ़ा दिया है। गुलजारीलाल नंदा फाउंडेशन की ओर से प्रतिष्ठित वैज्ञानिक संस्थानों के उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर की गई समीक्षा में दावा किया गया है कि हिमालयी राज्यों में 190 ग्लेशियर झीलें अत्यधिक संवेदनशील यानी ‘डेंजर जोन’ में हैं। इन झीलों के अचानक फटने की स्थिति में निचले क्षेत्रों में ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) का गंभीर खतरा पैदा हो सकता है।
फाउंडेशन के अनुसार, करीब 2,500 किलोमीटर लंबी हिमालयी श्रृंखला में 858 हैंगिंग ग्लेशियर चिन्हित किए गए हैं। पहाड़ों की ढलानों पर लटके ये ग्लेशियर टूटने या खिसकने की स्थिति में बड़े हिमस्खलन का कारण बन सकते हैं। वहीं, उत्तराखंड के अलकनंदा बेसिन में ही 219 अस्थिर हैंगिंग ग्लेशियर पाए जाने का दावा किया गया है, जिससे बद्रीनाथ, माणा सहित कई संवेदनशील क्षेत्रों पर खतरा बढ़ जाता है।
समीक्षा में कहा गया है कि भारतीय हिमालयी क्षेत्र में कुल 9,575 ग्लेशियर हैं। इनमें से 267 बड़े ग्लेशियरों पर सरकार और वैज्ञानिक संस्थानों की विशेष निगरानी होने की बात कही गई है। फाउंडेशन का कहना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण ग्लेशियरों के पीछे हटने और उनके आसपास नई झीलों के बनने की प्रक्रिया को अब गंभीरता से लेने की जरूरत है।
फाउंडेशन के चेयरमैन के. आर. अरुण ने समीक्षा सार्वजनिक करते हुए सरकार से संवेदनशील ग्लेशियर झीलों और ग्लेशियरों की सुरक्षा के लिए तत्काल वैज्ञानिक एवं तकनीकी कदम उठाने की अपील की है। उनका कहना है कि प्रकृति को पूरी तरह नियंत्रित करना संभव नहीं है, लेकिन मानवीय गतिविधियों को नियंत्रित कर और आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल कर आपदा के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
संवेदनशील क्षेत्रों में बड़े प्रोजेक्ट की हो समीक्षा
फाउंडेशन ने उच्च हिमालयी क्षेत्रों में बड़े बांधों और जलविद्युत परियोजनाओं की कड़ी पर्यावरणीय समीक्षा करने की मांग की है। समीक्षा में कहा गया है कि अत्यधिक संवेदनशील और डेंजर जोन वाले क्षेत्रों में ऐसे निर्माणों को लेकर विशेष सावधानी बरती जानी चाहिए।
इसके साथ ही केदारनाथ, बद्रीनाथ और गंगोत्री जैसे संवेदनशील पर्यटन क्षेत्रों में कैरिंग कैपेसिटी तय कर पर्यटकों और मानवीय गतिविधियों को नियंत्रित करने की जरूरत बताई गई है। फाउंडेशन का तर्क है कि संवेदनशील पर्वतीय क्षेत्रों में बढ़ता दबाव पर्यावरणीय अस्थिरता को और बढ़ा सकता है।
190 झीलों पर ऑटोमेटिक सेंसर और अर्ली वार्निंग सिस्टम
ग्लेशियर झीलों से संभावित तबाही रोकने के लिए फाउंडेशन ने सैटेलाइट आधारित निगरानी, ऑटोमेटिक वेदर स्टेशन और वॉटर लेवल सेंसर लगाने का सुझाव दिया है। इसके तहत झीलों के जलस्तर में अचानक वृद्धि होने पर निचले इलाकों तक तत्काल चेतावनी पहुंचाने की व्यवस्था विकसित करने की मांग की गई है।
खतरनाक स्तर तक पानी पहुंचने वाली झीलों में नियंत्रित जल निकासी (Controlled Discharge) की व्यवस्था करने का भी सुझाव दिया गया है। इसके लिए पाइपलाइन या नियंत्रित चैनल के माध्यम से पानी को धीरे-धीरे बाहर निकालने की तकनीक अपनाने की बात कही गई है, ताकि झील के अचानक फटने की आशंका कम हो सके।
अवैध निर्माण और अंधाधुंध शहरीकरण पर रोक की मांग
समीक्षा में अलकनंदा सहित हिमालयी नदी बेसिनों में बढ़ते शहरीकरण को भी चिंता का विषय बताया गया है। फाउंडेशन ने दावा किया है कि कुछ क्षेत्रों में पिछले दशकों के दौरान मानवीय बस्तियों में 616 प्रतिशत तक वृद्धि हुई है। ऐसे में नदी के प्राकृतिक रास्तों, बाढ़ क्षेत्रों और अस्थिर ढलानों पर होने वाले निर्माण को तत्काल नियंत्रित करने की जरूरत बताई गई है।
फाउंडेशन ने ठंडे और शुष्क क्षेत्रों में कृत्रिम ग्लेशियर विकसित करने जैसे स्थानीय उपायों को बढ़ावा देने की भी पैरवी की है। उसका कहना है कि सर्दियों के पानी को संरक्षित कर कृत्रिम रूप से जमाने की तकनीक से गर्मियों में पानी की उपलब्धता बढ़ाई जा सकती है।
‘विकास बनाम प्रकृति’ नहीं, संतुलित विकास जरूरी
गुलजारीलाल नंदा फाउंडेशन की समीक्षा का निष्कर्ष है कि हिमालय की नाजुक पारिस्थितिकी को देखते हुए विकास की मौजूदा रणनीति में बदलाव जरूरी है। 2013 की केदारनाथ त्रासदी और हाल के वर्षों में नेपाल सहित हिमालयी क्षेत्रों में सामने आई घटनाएं चेतावनी हैं कि ग्लेशियर और ग्लेशियर झीलों की अनदेखी भविष्य में भारी पड़ सकती है।
फाउंडेशन ने सरकार से 190 अत्यधिक संवेदनशील ग्लेशियर झीलों और 858 हैंगिंग ग्लेशियरों की वैज्ञानिक मैपिंग, निरंतर निगरानी, अर्ली वार्निंग सिस्टम और आपदा प्रबंधन की ठोस व्यवस्था विकसित करने की अपील की है। समीक्षा में स्पष्ट किया गया है कि हिमालय में विकास की जरूरत है, लेकिन यह विकास स्थानीय पर्यावरण की वहन क्षमता और वैज्ञानिक जोखिम आकलन के अनुरूप होना चाहिए।











