शिक्षकों की भर्ती लोक सेवा आयोग से कराने के प्रस्तावित विधेयक का विरोध, कहा- बाहरी नियंत्रण से प्रभावित होगी अकादमिक स्वतंत्रता
शिमला। हिमाचल प्रदेश के छह विश्वविद्यालयों में शिक्षकों की भर्ती प्रक्रिया में बदलाव कर नियुक्तियां लोक सेवा आयोग के माध्यम से किए जाने के प्रस्ताव के विरोध में हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय शिक्षक कल्याण संघ (HPUTWA) ने बुधवार को धरना-प्रदर्शन किया। प्रदर्शन में विश्वविद्यालय के वरिष्ठ प्रोफेसरों और शिक्षकों ने भाग लिया तथा प्रस्तावित विधेयक को विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता और अकादमिक स्वतंत्रता के लिए चिंताजनक बताया।
धरने को संबोधित करते हुए HPUTWA अध्यक्ष प्रो. नितिन व्यास ने कहा कि विश्वविद्यालयों में भर्ती का अधिकार उनकी स्वायत्तता का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसे बाहरी नियंत्रण में देने से विश्वविद्यालयों की संस्थागत पहचान और अकादमिक स्वतंत्रता कमजोर हो सकती है। उन्होंने कहा कि यदि विश्वविद्यालयों को नियमित प्रशासनिक और अकादमिक निर्णयों के लिए भी बाहरी स्वीकृतियों पर निर्भर होना पड़ा तो निर्णय प्रक्रिया धीमी होगी और इसका असर शिक्षण, शोध तथा नवाचार पर पड़ सकता है।
उन्होंने कहा कि स्वायत्तता और जवाबदेही एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। यदि किसी विश्वविद्यालय में अनियमितताओं की शिकायत या आरोप हैं तो उनकी निष्पक्ष जांच, ऑडिट और साक्ष्य आधारित मूल्यांकन के जरिए जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए। कुछ संस्थानों में कथित अनियमितताओं के आधार पर सभी स्वायत्त विश्वविद्यालयों की शक्तियों को सीमित करना उचित नहीं होगा।
CAS के मुद्दे से भी जोड़ा
HPUTWA ने विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता के मुद्दे को शिक्षकों के लंबे समय से चले आ रहे Career Advancement Scheme (CAS) के संघर्ष से भी जोड़कर देखा। संगठन का कहना है कि CAS और विश्वविद्यालय की स्वायत्तता केवल सेवा संबंधी विषय नहीं हैं, बल्कि शिक्षक की पेशेवर गरिमा, संस्थागत स्वतंत्रता और उच्च शिक्षा के भविष्य से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दे हैं।
धरने के दौरान शिक्षकों ने यह सवाल भी उठाया कि यदि Ph.D., शोध प्रकाशन, शोध अनुभव और अकादमिक उपलब्धियों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जाएगा तो उच्च शैक्षणिक योग्यता की प्रासंगिकता क्या रह जाएगी। शिक्षकों ने कहा कि उच्च शिक्षा की नीतियों का केंद्र ज्ञान, शोध, नवाचार और अकादमिक उत्कृष्टता होना चाहिए।
HPUTWA सचिव डॉ. अंकुश भारद्वाज ने कहा कि प्रस्तावित विधेयक केवल किसी एक विश्वविद्यालय या संगठन से जुड़ा मामला नहीं है। विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता और भर्ती अधिकार कमजोर होने का असर पूरे उच्च शिक्षा तंत्र पर पड़ सकता है। उन्होंने शिक्षकों और कर्मचारियों से अपने अधिकारों की रक्षा के लिए लोकतांत्रिक और संवैधानिक तरीके से एकजुट होकर आवाज उठाने का आह्वान किया।











