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इकोलॉजिकल संवेदनशील क्षेत्रों में सड़क निर्माण पर हाई कोर्ट सख्त, चंद्रताल, शिकारी देवी और चूड़धार का उदाहरण देकर जताई चिंता

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नई सड़कों और तारकोल बिछाने से जुड़े लंबित वन मंजूरी प्रस्ताव आगे न बढ़ाने के निर्देश

शिमला। हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने राज्य के पर्यावरणीय और पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में सड़क संपर्क बढ़ाने से जुड़े मामलों पर गंभीर चिंता जताई है। अदालत ने विशेष रूप से ऐसे क्षेत्रों में मोटरेबल सड़कें पहुंचने के बाद बढ़ने वाली मानवीय गतिविधियों, पर्यावरणीय प्रभाव और पेड़ों की कटाई के संभावित खतरे को लेकर सवाल उठाए हैं।


मुख्य न्यायाधीश जी.एस. संधावालिया और न्यायमूर्ति बिपिन सी. नेगी की खंडपीठ ने इस मुद्दे का स्वत: संज्ञान लेते हुए मामले को जनहित याचिका के रूप में दर्ज किया है। अदालत ने हिमाचल प्रदेश सरकार, वन विभाग और हिमाचल प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को नोटिस जारी कर मामले में जवाब दाखिल करने को कहा है।


सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने चंद्रताल झील, शिकारी देवी मंदिर और चूड़धार मंदिर जैसे पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील क्षेत्रों का उल्लेख किया। अदालत ने इस बात पर चिंता जताई कि इन क्षेत्रों तक मोटरेबल सड़क पहुंचने से आम लोगों और पर्यटकों की आवाजाही बढ़ सकती है, जिसका स्थानीय पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका है।

अदालत ने स्पष्ट किया कि संवेदनशील क्षेत्रों में सड़क निर्माण अथवा मौजूदा सड़कों को पक्का करने से जुड़े मामलों पर केवल सड़क संपर्क उपलब्ध कराने के दृष्टिकोण से विचार नहीं किया जा सकता। ऐसे मामलों में पर्यावरणीय प्रभाव और क्षेत्र की संवेदनशीलता को भी ध्यान में रखना आवश्यक है।


लंबित वन मंजूरी प्रस्तावों पर फिलहाल रोक


हाई कोर्ट ने निर्देश दिया है कि यदि पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में नई सड़क के निर्माण या मौजूदा सड़क पर तारकोल बिछाने के लिए वन मंजूरी से संबंधित कोई प्रस्ताव लंबित है, तो उसे फिलहाल आगे न बढ़ाया जाए।


अदालत का यह निर्देश फिलहाल न्यायिक कार्यवाही के दौरान जारी अंतरिम दिशा-निर्देश के रूप में देखा जा रहा है। मामले में अंतिम निर्णय अभी नहीं हुआ है और सरकार तथा संबंधित विभागों का जवाब आने के बाद अदालत आगे इस मुद्दे पर विचार करेगी।


चंद्रताल में कैंपिंग और कचरा प्रबंधन पर सवाल


सुनवाई के दौरान चंद्रताल झील के आसपास रात में कैंपिंग की अनुमति दिए जाने को लेकर भी अदालत ने सवाल उठाए। खंडपीठ ने जानना चाहा कि पर्यटकों के रात्रि प्रवास के दौरान उत्पन्न होने वाले प्लास्टिक और अन्य ठोस कचरे का निस्तारण किस प्रकार किया जा रहा है।


अदालत ने यह भी पूछा कि क्या ऐसे संवेदनशील पर्यटन स्थलों पर मोबाइल टॉयलेट जैसी आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध हैं और पर्यटकों से उत्पन्न कचरे के वैज्ञानिक एवं उचित निस्तारण की व्यवस्था सुनिश्चित की जा रही है।


सरकार और विभागों से मांगा जवाब


मामले में हिमाचल प्रदेश सरकार को प्रधान सचिव (वन), प्रधान मुख्य अरण्यपाल, वन विभाग तथा हिमाचल प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सदस्य सचिव के माध्यम से पक्षकार बनाया गया है।
हाई कोर्ट ने संबंधित पक्षों से पर्यावरणीय संवेदनशील क्षेत्रों में सड़क निर्माण, मानव गतिविधियों और कचरा प्रबंधन से जुड़े पहलुओं पर जवाब मांगा है। मामले की अगली सुनवाई 28 सितंबर को होगी।