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मानसून सत्र: 2,700 रुपये में खरीदी जमीन 18 लाख में अधिग्रहण, विधानसभा में घमासान

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जल जीवन मिशन के टैंक निर्माण और जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया पर उठे सवाल, विधायक आशीष शर्मा ने जांच की मांग की


शिमला। हिमाचल प्रदेश विधानसभा के मानसून सत्र में जल जीवन मिशन की एक योजना के लिए जमीन अधिग्रहण और उसके भुगतान को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष आमने-सामने आ गए। हमीरपुर के विधायक आशीष शर्मा ने सदन में सवाल उठाया कि जिस जमीन को वर्ष 2012 में कथित तौर पर महज 2,700 रुपये में खरीदा गया था, उसी जमीन के लिए बाद में सरकार ने करीब 18 लाख रुपये का भुगतान किया। विधायक ने जमीन की खरीद से लेकर अधिग्रहण तक की प्रक्रिया की जांच की मांग की।


आशीष शर्मा ने कहा कि सरकारी जानकारी के अनुसार राजीव सिंह, मिखिता, नैंसी और सुबिंदर सिंह समेत चार लोगों को जमीन के लिए करीब 18 लाख रुपये का भुगतान किया गया। उन्होंने सवाल उठाया कि 14 साल के अंतराल में जमीन की कीमत में इतना बड़ा अंतर कैसे आया। उन्होंने कहा कि सरकार किसी भी दल की हो, जनता के पैसे के इस्तेमाल में पूरी पारदर्शिता होनी चाहिए।


बिना अनुमति टैंक बनाने का भी आरोप


बहस के दौरान जमीन से जुड़े विवाद की पृष्ठभूमि भी सदन में सामने आई। जमीन मालिक पक्ष के अनुसार जल जीवन मिशन के तहत उनकी अनुमति के बिना जमीन पर पानी के टैंक का निर्माण शुरू कर दिया गया था। टैंक का करीब आधा निर्माण पूरा हो चुका था। जमीन मालिकों ने जमीन देने से इनकार करते हुए कहा था कि टैंक के आसपास 500 मीटर के दायरे में माइनिंग की अनुमति नहीं मिलती। इससे भविष्य में क्रशर या माइनिंग गतिविधियों के लिए एनओसी लेने में परेशानी हो सकती थी।


विवाद के बाद शुरू हुई अधिग्रहण प्रक्रिया


जमीन मालिकों के अनुसार नादौन लोअर कोर्ट में इसको लेकर विवाद हुआ और मामला अदालत तक पहुंचा। बाद में संबंधित विधायक की ओर से बातचीत के जरिए विवाद सुलझाने का प्रयास किया गया। बताया गया कि टैंक का आधा निर्माण हो चुका था और जमीन का मामला नहीं सुलझने पर विभागीय कर्मचारियों पर कार्रवाई की स्थिति बन सकती थी। इसके बाद भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू की गई।


जमीन मालिक पक्ष ने बताया कि जमीन परिवार की मुस्तरका यानी साझा संपत्ति थी। अधिग्रहण की राशि परिवार के सदस्यों के खातों में पहुंची और उनके हिस्से में भी करीब ढाई से तीन लाख रुपये आए।


बाजार भाव से काफी कम में दी जमीन का दावा


जमीन मालिक पक्ष की ओर से कहा गया कि संबंधित क्षेत्र में एक कनाल जमीन की कीमत करीब 50 लाख रुपये तक बताई जाती है। इसके मुकाबले करीब दस कनाल जमीन के लिए कुल 18 लाख रुपये का भुगतान हुआ। उनका कहना था कि जमीन बाजार भाव की तुलना में काफी कम कीमत पर दी गई, क्योंकि उद्देश्य क्षेत्र के लोगों को पानी उपलब्ध करवाना था।


नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर ने मांगी पूरी जानकारी


पूर्व मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने सरकार से जमीन की खरीद और बाद में विभाग की ओर से किए गए अधिग्रहण की पूरी जानकारी सदन में रखने की मांग की। उन्होंने पूछा कि जमीन कब खरीदी गई, किस दर पर खरीदी गई और बाद में विभाग ने किस दर पर उसका अधिग्रहण किया।


विधायक विक्रम सिंह ठाकुर ने भी कहा कि सदन में मूल सवाल का स्पष्ट जवाब मिलना चाहिए। यदि जमीन 2,700 रुपये में खरीदी गई और बाद में सरकार ने 18 लाख रुपये में अधिग्रहित की, तो इस अंतर की वजह सामने आनी चाहिए।


सरकार बोली- पानी की योजना के लिए जरूरी थी जमीन


मामले पर उप मुख्यमंत्री ने कहा कि यह विषय पहले भी सदन में उठ चुका है। उन्होंने कहा कि पानी की योजना के लिए जमीन की आवश्यकता थी और इसी उद्देश्य से उसका भुगतान किया गया।
मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू ने कहा कि जमीन मालिकों की ओर से जमीन को लेकर विवाद हुआ था और मामला अदालत तक पहुंचा था। अब वहां पानी की योजना बन चुकी है। उन्होंने कहा कि क्षेत्र के लोगों को पानी उपलब्ध करवाना जरूरी था।


फिलहाल विधानसभा में उठे इस मामले ने जमीन की खरीद कीमत, सरकारी अधिग्रहण में हुए भुगतान और बिना अनुमति टैंक निर्माण शुरू किए जाने के आरोप को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। विपक्ष ने जहां पूरे मामले की जांच की मांग की है, वहीं सरकार ने इसे लोगों को पेयजल उपलब्ध करवाने से जुड़ा आवश्यक कदम बताया है।