‘नीलम नीलू चौहान’ नाम से प्रोफाइल चलाने का आरोप, शिकायतकर्ता ने मानसिक प्रताड़ना और सामाजिक प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने की दी शिकायत; पुलिस जांच में डिजिटल साक्ष्यों की भूमिका अहम
शिमला। हिमाचल प्रदेश बाल अधिकार संरक्षण आयोग (HPCPCR) की सदस्य मोनिता चौहान के खिलाफ कथित फर्जी फेसबुक प्रोफाइल के जरिए शिकायतकर्ता और उसके परिवार को निशाना बनाने तथा कथित तौर पर आपत्तिजनक टिप्पणियां कर सामाजिक प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने के आरोप में पुलिस ने मामला दर्ज किया है। शिकायतकर्ता अतुल शर्मा की शिकायत पर पुलिस थाना शिमला ईस्ट में एफआईआर दर्ज की गई है।
शिकायत में आरोप लगाया गया है कि ‘Neelam Nillu Chauhan’ नाम से एक फेसबुक प्रोफाइल तैयार कर शिकायतकर्ता के बारे में कथित रूप से अपमानजनक और चरित्र को प्रभावित करने वाली टिप्पणियां सोशल मीडिया पर प्रसारित की गईं। शिकायतकर्ता का दावा है कि इस गतिविधि के कारण उसे और उसके परिवार को मानसिक परेशानी तथा सामाजिक प्रतिष्ठा को नुकसान उठाना पड़ा।
डिजिटल साक्ष्यों से जुड़ी जांच पर टिकी निगाहें
मामले में सबसे अहम पहलू कथित फेसबुक प्रोफाइल की तकनीकी पहचान को लेकर है। शिकायत के अनुसार, साइबर जांच और Meta से प्राप्त तकनीकी जानकारी के आधार पर उक्त प्रोफाइल को कुछ ऐसे मोबाइल नंबरों और डिवाइस से जोड़ा गया, जिनका संबंध मोनिता चौहान से बताया गया है।
हालांकि, किसी मोबाइल नंबर, डिवाइस या डिजिटल अकाउंट का तकनीकी रूप से किसी व्यक्ति से जुड़ना अपने आप में आपराधिक दोष सिद्ध होने के बराबर नहीं है। जांच एजेंसी को यह स्थापित करना होगा कि संबंधित अकाउंट वास्तव में किस व्यक्ति द्वारा बनाया और संचालित किया गया तथा कथित पोस्ट किसकी जानकारी, मंशा और नियंत्रण में प्रकाशित हुए। इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड की प्रमाणिकता और उसकी evidentiary value भी आगे की जांच और न्यायिक प्रक्रिया में महत्वपूर्ण होगी।
BNS की धाराओं को लेकर कानूनी पेंच
पुलिस ने मामले में भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 319(2) और धारा 356 से संबंधित प्रावधानों के तहत कार्रवाई की बात सामने आई है। BNS की धारा 319 ‘Cheating by personation’ से संबंधित है। इसके तहत किसी दूसरे व्यक्ति का रूप धारण कर धोखाधड़ी करना अपराध है और दोष सिद्ध होने पर पांच वर्ष तक की सजा, जुर्माना या दोनों का प्रावधान है।
वहीं BNS की धारा 356 मानहानि से संबंधित है। कानून के अनुसार, किसी व्यक्ति के बारे में ऐसी बात प्रकाशित या प्रसारित करना, जिससे उसकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने का इरादा हो अथवा ऐसा नुकसान होने की जानकारी या कारण हो, मानहानि के दायरे में आ सकता है, हालांकि कानून में इसके कई अपवाद भी दिए गए हैं। धारा 356(2) में दोष सिद्ध होने पर दो वर्ष तक साधारण कारावास, जुर्माना, दोनों अथवा सामुदायिक सेवा का प्रावधान है।
मानहानि के मामलों में प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण कानूनी पहलू यह भी है कि BNSS की धारा 222 के अनुसार सामान्यतः अदालत संज्ञान संबंधित व्यक्ति द्वारा की गई शिकायत पर लेती है। इसलिए एफआईआर दर्ज होना और मानहानि के आरोप का न्यायालय में अंतिम रूप से सिद्ध होना दो अलग-अलग कानूनी चरण हैं।
आयोग की सदस्य पर आरोप ने बढ़ाई गंभीरता
मामले का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि आरोप हिमाचल प्रदेश बाल अधिकार संरक्षण आयोग की एक सदस्य से जुड़े हैं। आयोग बच्चों के अधिकारों और उनके संरक्षण से संबंधित महत्वपूर्ण वैधानिक संस्था है। ऐसे में आयोग से जुड़े पदाधिकारी पर सोशल मीडिया के कथित दुरुपयोग और चरित्र हनन जैसे आरोप सामने आने के बाद मामले की निष्पक्ष और तथ्यपरक जांच को लेकर स्वाभाविक रूप से नजरें रहेंगी।
फिलहाल उपलब्ध तथ्यों के आधार पर यह स्पष्ट करना जरूरी है कि एफआईआर किसी व्यक्ति के खिलाफ लगाए गए आरोपों की शुरुआत है, दोष सिद्ध होने का अंतिम निष्कर्ष नहीं। आरोपों की सत्यता, कथित फेसबुक अकाउंट के वास्तविक संचालक और डिजिटल साक्ष्यों की वैधानिक स्वीकार्यता का निर्धारण जांच तथा आगे की न्यायिक प्रक्रिया में होगा।
पुलिस जांच में अब कथित फर्जी प्रोफाइल की लॉग-इन
गतिविधियां, संबंधित मोबाइल नंबर, डिवाइस, आईपी/तकनीकी विवरण, Meta से प्राप्त रिकॉर्ड तथा कथित पोस्टों की प्रमाणिकता जैसे पहलुओं की जांच महत्वपूर्ण मानी जाएगी। यदि इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों की कड़ियां आरोपों की पुष्टि करती हैं तो मामला आगे कानूनी रूप से और गंभीर हो सकता है।











