भाजपा विधायक रणधीर शर्मा ने कानून की वैधता और महिला अधिकारों पर उठाए सवाल
बोले- चुनाव प्रक्रिया शुरू होने से एक दिन पहले नियम बदलना गलत
सरकार ने कहा- अतिक्रमण करने वालों के परिजनों को आगे कर चुनाव लड़ाने की व्यवस्था रोकना उद्देश्य
शिमला। हिमाचल प्रदेश विधानसभा में पंचायती राज संशोधन विधेयक को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी बहस हुई। सरकार ने अतिक्रमण के मामलों में सख्ती बरतने के उद्देश्य से परिवार की परिभाषा में पुत्रवधू को भी शामिल करने का प्रावधान किया है। सरकार का तर्क है कि अयोग्य घोषित व्यक्ति अपने परिवार के किसी सदस्य, विशेषकर पत्नी या बहू, को आगे कर चुनाव लड़वा कर अप्रत्यक्ष रूप से चुनावी प्रक्रिया में शामिल होने की कोशिश न कर सके।
पंचायती राज मंत्री ने कहा कि पंचायत चुनाव के दौरान सरकार के समक्ष कई प्रतिनिधिमंडलों ने यह मामला उठाया था। शिकायत थी कि अतिक्रमण के कारण चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य हुए लोग अपनी पत्नी या बहू को प्रत्याशी बनाकर चुनाव मैदान में उतार रहे हैं। इसी खामी को दूर करने के लिए छह मई 2026 को अध्यादेश लाया गया था, जिसे अब विधेयक के माध्यम से कानून का हिस्सा बनाया जा रहा है। मंत्री ने कहा कि नगर निकायों से संबंधित कानूनों में भी इस तरह की व्यवस्था है, इसलिए पंचायतों में भी समान प्रावधान किया जाना जरूरी है।
मंत्री ने कहा कि विवाह के बाद पुत्रवधू परिवार की संपत्ति और उससे जुड़ी देनदारियों में हिस्सेदार होती है। इसलिए अतिक्रमण के मामलों में परिवार की परिभाषा में उसे शामिल करने का प्रावधान किया गया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि संशोधन किसी व्यक्ति विशेष को ध्यान में रखकर नहीं किया गया है, बल्कि कानूनी विशेषज्ञों की राय के बाद व्यापक उद्देश्य से इसे लाया गया है।
वहीं भाजपा विधायक रणधीर शर्मा ने विधेयक का विरोध करते हुए इसके समय और कानूनी वैधता पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि चुनाव प्रक्रिया शुरू होने और नामांकन की तारीख से ठीक एक दिन पहले अध्यादेश लाकर नियम बदलना उचित नहीं है। उनके अनुसार, यदि किसी महिला के ससुर या पति ने अतिक्रमण किया है तो जरूरी नहीं कि विवाह से पहले उसका उस संपत्ति या अतिक्रमण से कोई संबंध रहा हो। ऐसे में उसे केवल ससुराल के परिवार का हिस्सा होने के आधार पर चुनाव लड़ने से रोकना अन्यायपूर्ण होगा।
रणधीर शर्मा ने इसे महिला अधिकारों और लोकतांत्रिक अधिकारों से जुड़ा मामला बताते हुए कहा कि निर्दोष महिलाओं को उनके पति या ससुर के कथित अतिक्रमण की सजा नहीं दी जा सकती। उन्होंने सवाल उठाया कि जब महिला की जाति जन्म और मायके से तय होती है, तो अतिक्रमण के मामले में उसे ससुराल के परिवार का सदस्य मानकर अयोग्य क्यों किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि यदि यह मामला अदालत में गया तो कानून की वैधता पर सवाल उठ सकते हैं और सरकार के लिए इसे न्यायिक कसौटी पर बचाना मुश्किल होगा।
रणधीर शर्मा ने सरकार से विधेयक वापस लेकर नए सिरे से विचार करने की मांग की। उन्होंने कहा कि चुनाव प्रक्रिया शुरू होने के बाद इस तरह का बदलाव करना उचित नहीं है और सरकार को आवश्यक संशोधनों के बाद ही इसे दोबारा लाना चाहिए।
जवाब में मंत्री ने कहा कि जाति और अतिक्रमण दो अलग-अलग विषय हैं। सरकार का उद्देश्य किसी महिला को निशाना बनाना नहीं, बल्कि अतिक्रमण को हतोत्साहित करना और अयोग्य व्यक्ति के परिवार के किसी सदस्य को आगे कर चुनाव लड़ाने की संभावित व्यवस्था पर रोक लगाना है।
बहस के बाद सदन में विधेयक को ध्वनिमत से विधेयक का अंग बनाने की मंजूरी दी गई। इसके बाद खंड एक, जिसमें विधेयक का संक्षिप्त नाम और विधायी सूत्र शामिल हैं, उसे भी ध्वनिमत से पारित कर दिया गया। इस तरह पंचायती राज संशोधन विधेयक के सभी खंड विधानसभा से पारित हो गए।












